New Delhi News: देश में दवाओं पर मनमानी एमआरपी छापकर मरीजों से हजारों प्रतिशत मुनाफा वसूलने और पैथोलॉजी लैब्स में बिना जांच के फर्जी रिपोर्ट बनाने के मामले सामने आए हैं। सुप्रीम कोर्ट की सख्ती के बाद सरकार ने कैंसर की दवाओं पर मुनाफा 30 प्रतिशत तक सीमित किया है। वहीं, गुजरात और उत्तर प्रदेश में खाद्य एवं औषधि प्रशासन ने छापेमारी कर बड़ी अनियमितताएं पकड़ी हैं।
देश भर में मरीजों को सस्ती दवाएं अत्यधिक महंगे दामों पर बेचने और नकली दवाओं के जरिए स्वास्थ्य के साथ खिलवाड़ करने के मामलों पर प्रशासन ने कार्रवाई शुरू की है। एक टेलीविजन समाचार कार्यक्रम ‘देश की पाठशाला’ की पड़ताल और सरकारी आंकड़ों के अनुसार, कई दवाओं पर खरीद मूल्य से कई गुना अधिक अधिकतम खुदरा मूल्य (एमआरपी) छापकर मोटा मुनाफा कमाया जा रहा है। सुप्रीम कोर्ट द्वारा दवाओं के खुदरा मूल्य और एमआरपी के बीच के बड़े अंतर पर चिंता जताए जाने के बाद केंद्र और राज्य सरकारें इस पर नियंत्रण के लिए कदम उठा रही हैं।
सूरत में पशुओं के लिवर टॉनिक को बच्चों की दवा बताकर बेचने का आरोप
गुजरात के सूरत में पुलिस की स्पेशल टीम और खाद्य एवं औषधि प्रशासन (एफडीए) ने एक मेडिकल स्टोर पर छापेमारी कर मोहम्मद साजिद मुल्ला नामक व्यक्ति को गिरफ्तार किया है। पुलिस के अनुसार, आरोपी पर घोड़े, गाय और भैंस जैसे पशुओं के लिए इस्तेमाल होने वाले लिवर टॉनिक को छोटी शीशियों में भरकर बच्चों की दवा के रूप में बेचने का आरोप है।
जांच में सामने आया कि आरोपी 60 मिलीलीटर और 100 मिलीलीटर की शीशियों पर बच्चों की दवा का स्टीकर लगाकर उन्हें बेचता था। पशुओं की एक लीटर दवा की एमआरपी 360 रुपये थी, जिसे 100 मिलीलीटर की शीशी में 140 रुपये (यानी 1400 रुपये प्रति लीटर) की एमआरपी पर बेचा जा रहा था। इस प्रकार प्रति लीटर एक हजार रुपये से अधिक का सीधा अंतर पाया गया। पुलिस मामले की विस्तृत जांच कर रही है।
कैंसर की दवाओं पर 30 प्रतिशत मार्जिन तय, सुप्रीम कोर्ट ने मांगा एक्शन प्लान
कैंसर की महंगी दवाओं से मरीजों को राहत देने के लिए सरकार ने 8 अक्टूबर को एक महत्वपूर्ण निर्णय लिया। इसके तहत कैंसर की दवाओं पर व्यापारिक मुनाफा (ट्रेड मार्जिन) 30 प्रतिशत तक सीमित कर दिया गया है। यह मुनाफा दवा कंपनी से निकलकर मरीज तक पहुंचने की कीमत के आधार पर तय होगा।
उदाहरण के लिए, जिस कैंसर की दवा की रिटेलर को मिलने वाली कीमत (पीटीआर) 2,700 रुपये थी और जिस पर 27,000 रुपये एमआरपी (900 प्रतिशत मार्जिन) छपी होती थी, सरकारी फैसले के बाद उसकी अधिकतम कीमत 3,857 रुपये हो जाएगी। इससे मरीज को एक दवा पर 23,143 रुपये की बचत होगी। सरकार का अनुमान है कि इस फैसले से मरीजों को सालाना करीब 2,500 करोड़ रुपये की बचत होगी।
हालांकि, सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले की सुनवाई के दौरान सरकार से पूछा है कि जब कैंसर की दवाओं का मार्जिन तय किया जा सकता है, तो अन्य दवाइयों की कीमतों पर नियंत्रण क्यों नहीं किया जा सकता। न्यायालय ने सरकार को इस संबंध में 27 अक्टूबर तक अपना एक्शन प्लान प्रस्तुत करने का समय दिया है।
उत्तर प्रदेश में 214 अस्पतालों और मेडिकल कॉलेजों की फार्मेसी में जांच
राज्य स्तर पर भी दवाओं की कीमतों में अंतर की जांच की जा रही है। उत्तर प्रदेश के खाद्य एवं औषधि प्रशासन विभाग ने राज्य के 214 मेडिकल कॉलेजों और निजी अस्पतालों की फार्मेसी में 130 दवाओं का विश्लेषण किया।
जांच में पाया गया कि 36 दवाओं पर एमआरपी उनकी खरीद कीमत से 10 गुना से अधिक थी, जबकि कुछ दवाओं में यह अंतर 67 गुना तक मिला। बैक्टीरियल संक्रमण में काम आने वाले पॉलीमाइक्सिन-बी इंजेक्शन की खरीद कीमत करीब 74 रुपये थी, लेकिन उस पर 4,981 रुपये एमआरपी छपी थी। इसी तरह बेवासिजुमैब दवा की खरीद कीमत 7,541 रुपये थी, जबकि उसकी एमआरपी 69,995 रुपये (62,453 रुपये का अंतर) दर्ज थी।
निजी अस्पतालों की इन-हाउस फार्मेसी और मोनोपोली दवाओं का मुद्दा
सुप्रीम कोर्ट ने इस बात पर भी गंभीर टिप्पणी की है कि कई निजी अस्पतालों में मरीजों को अस्पताल के भीतर स्थित फार्मेसी से ही महंगी दवाएं खरीदने के लिए बाध्य किया जाता है। न्यायालय ने कहा कि अस्पताल अब सेवा प्रदाता के बजाय मुनाफा कमाने वाली इंडस्ट्री की तरह काम कर रहे हैं।
दवा कारोबार से जुड़े सूत्रों के अनुसार, अधिक एमआरपी छपने से दुकानदार मरीज को छूट दिखाने के बावजूद बड़ा मुनाफा कमा लेते हैं। इसके अलावा, कुछ दवा कंपनियां विशेष (मोनोपोली) उत्पाद बनाकर सीधे अस्पतालों और डॉक्टरों से संपर्क करती हैं। ऐसी दवाएं केवल संबंधित अस्पताल या उसके पास की चुनिंदा दुकानों पर ही मिलती हैं और उन पर कोई छूट नहीं दी जाती।
पैथोलॉजी लैब्स में ‘सिंक टेस्ट’ और लोकल सर्कल्स का सर्वे
दवाओं के अलावा बीमारी की जांच के नाम पर पैथोलॉजी लैब्स में होने वाली अनियमितताएं भी सामने आई हैं, जिन्हें ‘सिंक टेस्ट’ कहा जाता है। इस प्रक्रिया में मरीज के खून या यूरिन का सैंपल तो लिया जाता है, लेकिन सस्ते टेस्ट के झांसे में बिना पूरी जांच किए सैंपल को फेंक दिया जाता है। इसके बाद पुराने आंकड़ों या अनुमान के आधार पर सामान्य (नॉर्मल) वैल्यू लिखकर फर्जी रिपोर्ट तैयार कर दी जाती है। इससे समय पर बीमारी की पहचान नहीं हो पाती।
पैथोलॉजी लैब्स की विश्वसनीयता को लेकर ‘लोकल सर्कल्स’ द्वारा किए गए एक सर्वे में 48 हजार से अधिक लोगों की राय ली गई, जिसमें निम्नलिखित तथ्य सामने आए:
- 35 प्रतिशत लोगों ने कहा कि उन्हें पैथोलॉजी लैब्स पर भरोसा नहीं है।
- 34 प्रतिशत लोगों ने गलत पैथोलॉजी रिपोर्ट मिलने की बात स्वीकार की।
- 50 प्रतिशत लोगों का कहना था कि उन्हें जरूरत से ज्यादा टेस्ट लिखे गए।
- 66 प्रतिशत लोगों ने बताया कि डॉक्टर ने उन्हें ऐसी लैब से टेस्ट करवाने को कहा, जहां से डॉक्टर को कमीशन मिलता है।
भारत में कैसे तय होती है दवाओं की कीमत?
भारत में दवाओं को मुख्य रूप से दो श्रेणियों में बांटा गया है—शेड्यूल्ड और नॉन-शेड्यूल्ड दवाएं।
शेड्यूल्ड दवाएं वे हैं जो राष्ट्रीय आवश्यक दवा सूची (एनएलईएम) में शामिल हैं। इनकी कीमत राष्ट्रीय औषधि मूल्य निर्धारण प्राधिकरण (एनपीपीए) द्वारा औषधि मूल्य नियंत्रण आदेश (डीपीसीओ) 2013 के तहत तय की जाती है। इसके लिए कम से कम 1 प्रतिशत बाजार हिस्सेदारी वाली ब्रांडेड और जेनेरिक दवाओं की औसत कीमत में 16 प्रतिशत मार्जिन जोड़कर अधिकतम कीमत (सीलिंग प्राइस) निर्धारित होती है। सरकारी आंकड़ों के मुताबिक, एनपीपीए ने 935 फॉर्मूलेशन्स की सीलिंग प्राइस तय कर रखी है।
दूसरी ओर, नॉन-शेड्यूल्ड दवाएं एनएलईएम की सूची से बाहर होती हैं और इनकी शुरुआती कीमत कंपनियां स्वयं तय करती हैं। सरकार का नियम है कि कंपनियां एक साल में इनकी एमआरपी में 10 प्रतिशत से अधिक की वृद्धि नहीं कर सकतीं। वर्ष 2022 में एनपीपीए के एक अध्ययन में पाया गया था कि भारत में नॉन-शेड्यूल्ड दवाओं का सालाना कारोबार 1 लाख 37 हजार करोड़ रुपये था, जो कुल फार्मा बाजार का करीब 81 प्रतिशत है। इस अध्ययन में 100 रुपये से अधिक कीमत वाली प्रति टैबलेट दवाओं में सबसे ज्यादा मार्जिन पाया गया था।
संसदीय समिति और केमिस्ट अलायंस के सुझाव
रिटेल डिस्ट्रीब्यूटर केमिस्ट अलायंस का मानना है कि किसी भी दवा का कुल ट्रेड मार्जिन 30 प्रतिशत (20 प्रतिशत रिटेलर और 10 प्रतिशत डिस्ट्रीब्यूटर) से अधिक नहीं होना चाहिए।
वहीं, स्वास्थ्य और परिवार कल्याण संबंधी संसद की स्थायी समिति ने भी अगस्त में अपनी रिपोर्ट में दवाओं और मेडिकल डिवाइसेज में मुनाफाखोरी पर चिंता जताई थी। समिति ने सिफारिश की है कि किसी भी दवा या मेडिकल डिवाइस की लैंडिंग प्राइस (सप्लाई चेन में पहुंचने की लागत) और एमआरपी के बीच का अंतर 20 प्रतिशत से अधिक नहीं होना चाहिए। समिति ने आपातकालीन जीवन रक्षक दवा ‘टेनेक्टेप्लेस’ का उदाहरण देते हुए बताया कि यह रिटेलर को करीब 18 हजार रुपये में मिलती है, जबकि मरीज को इसके लिए 50 हजार रुपये चुकाने पड़ते हैं। इसी प्रकार दांतों के इलाज में काम आने वाले क्लियर एलाइनर की कीमतों को भी नियंत्रित करने की जरूरत बताई गई है, जिन्हें 1.5 लाख से 5 लाख रुपये तक में बेचा जा रहा है।
