35 साल के आर्थिक उदारीकरण से बदला भारतीय शेयर बाजार, सेंसेक्स की केवल 7 पुरानी कंपनियां बरकरार

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Delhi News: आर्थिक उदारीकरण के 35 वर्षों में भारतीय शेयर बाजार और कॉरपोरेट जगत की तस्वीर पूरी तरह बदल चुकी है। 1991 के बाद से बीएसई सेंसेक्स में शामिल 30 में से केवल 7 दिग्गज कंपनियां ही अपना स्थान बरकरार रख सकी हैं।

विश्लेषण के अनुसार यह बदलाव अर्थव्यवस्था के विनिर्माण मॉडल से सेवा क्षेत्र और वित्तीय सेवाओं की ओर बढ़ते झुकाव को स्पष्ट दिखाता है। उदारीकरण के बाद आईटी और बैंकिंग क्षेत्र का तेजी से विस्तार हुआ, जिससे कई पुरानी और पारंपरिक औद्योगिक कंपनियां पिछड़ गईं।

इन 7 प्रमुख दिग्गज कंपनियों ने सेंसेक्स में बनाई रखी जगह

सेंसेक्स में 1991 से लगातार अपनी मौजूदगी बनाए रखने वाली कंपनियों में रिलायंस इंडस्ट्रीज, टाटा स्टील, हिंदुस्तान यूनिलीवर, आईटीसी, लार्सन एंड टुब्रो, महिंद्रा एंड महिंद्रा और टाटा मोटर्स शामिल हैं। इन कंपनियों ने बदलते माहौल के अनुरूप खुद को ढाला है।

इसके विपरीत बल्लारपुर इंडस्ट्रीज, प्रीमियर ऑटोमोबाइल्स, हिंदुस्तान मोटर्स, फ्यूचुरा पॉलिएस्टर और जेनिथ स्टील जैसी कई पुरानी कंपनियां या तो बंद हो गईं या बाजार से बाहर हो गईं। वहीं एसीसी, नेस्ले और ग्रासिम जैसी कंपनियां बड़ी होने के बाद भी सेंसेक्स से बाहर हैं।

पारंपरिक विनिर्माण क्षेत्र के मुकाबले बढ़ा सेवा क्षेत्र का दबदबा

वर्ष 1991 में सेंसेक्स की 30 में से 28 कंपनियां विनिर्माण और औद्योगिक क्षेत्र से संबंधित थीं। उस समय सेवा क्षेत्र का प्रतिनिधित्व बहुत कम था। आज बैंकिंग, वित्तीय सेवाएं, बीमा और आईटी कंपनियां सेंसेक्स में सबसे बड़ा हिस्सा रखती हैं।

इस अवधि में पारिवारिक समूहों के प्रभुत्व में भी भारी कमी आई है। 1991 में 20 कंपनियां पारिवारिक समूहों के अधीन थीं, जबकि अब संस्थागत और स्वतंत्र स्वामित्व वाली कंपनियों की हिस्सेदारी बढ़ी है। सार्वजनिक क्षेत्र की कंपनियां भी सूचकांक का प्रमुख हिस्सा बनी हैं।

सेंसेक्स ने 35 वर्षों की यात्रा में दी शानदार बढ़त

मार्च 1991 में सेंसेक्स 1,168 अंकों पर था, जो जुलाई 2026 के अंत तक बढ़कर 78,094.6 अंक पर पहुंच गया। इस दौरान सूचकांक में लगभग 67 गुना की जबरदस्त वृद्धि दर्ज की गई है, जो अर्थव्यवस्था के बड़े विस्तार को दर्शाती है।

इसी अवधि में सेंसेक्स की कंपनियों का कुल बाजार पूंजीकरण ₹20,194 करोड़ से उछलकर ₹157.2 लाख करोड़ हो गया। विशेषज्ञों के अनुसार यह ऐतिहासिक बदलाव पारंपरिक उद्योगों से हटकर आधुनिक वित्तीय और उपभोक्ता अर्थव्यवस्था की ओर देश के बढ़ते कदमों का प्रमाण है।

Desh Raj
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