सुप्रीम कोर्ट पहुंचा यूपीआई मर्चेंट डिस्काउंट रेट विवाद, केंद्र सरकार, आरबीआई और एनपीसीआई को नोटिस जारी कर मांगा जवाब

Share

- Advertisement -

New Delhi News: यूपीआई के जरिए 2,000 रुपए से अधिक के मर्चेंट भुगतानों पर मर्चेंट डिस्काउंट रेट लगाने का मामला सुप्रीम कोर्ट पहुंच गया है। शीर्ष अदालत ने केंद्र सरकार, भारतीय रिजर्व बैंक और एनपीसीआई को नोटिस जारी किया है। सभी पक्षों को चार सप्ताह के भीतर अपना विस्तृत जवाब दाखिल करना होगा।

वित्त मंत्रालय की नई अधिसूचनाओं को दी गई चुनौती

मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत, जस्टिस जॉयमाल्या बागची और जस्टिस वी. मोहना की पीठ ने इस मामले की सुनवाई की। याचिका में वित्त मंत्रालय की 14 और 15 सितंबर की अधिसूचनाओं को चुनौती दी गई है। याचिकाकर्ता ने 2,000 रुपए से अधिक के पर्सन-टू-मर्चेंट ट्रांजैक्शन पर अधिकतम 0.4 फीसदी शुल्क के फैसले को रद्द करने की मांग की है।

यह प्रस्तावित व्यवस्था 15 अक्टूबर 2026 से लागू होनी है। सुनवाई के दौरान याचिकाकर्ता ने दलील दी कि यूपीआई विस्तार से काले धन के लेनदेन में कमी आई है। उन्होंने कहा कि बिना पर्याप्त कानूनी आधार, पारदर्शिता और सार्वजनिक विमर्श के यह शुल्क लगाया गया है। इसलिए इस अधिसूचना को तुरंत निरस्त किया जाना चाहिए।

केंद्र सरकार ने अदालत में रखा अपना पक्ष

केंद्र सरकार की ओर से अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल आर. वेंकटरमणी ने अदालत को बताया कि यूपीआई के लगभग 96 फीसदी मर्चेंट ट्रांजैक्शन इस व्यवस्था से बाहर रहेंगे। सरकार ने स्पष्ट किया कि 2,000 रुपए तक के पर्सन-टू-मर्चेंट भुगतान और तय श्रेणी के छोटे व्यापारियों के लिए शून्य-एमडीआर की व्यवस्था पहले की तरह ही लागू रहेगी।

सुनवाई में जस्टिस जॉयमाल्या बागची ने शुल्क के कानूनी स्वरूप पर सवाल उठाया। उन्होंने पूछा कि अगर यह सरकारी फीस नहीं है तो इसकी कानूनी स्थिति क्या है। केंद्र ने जवाब दिया कि यह सेटलमेंट शुल्क है जिससे सरकार को कोई राजस्व नहीं मिलेगा और डेबिट-क्रेडिट कार्ड की तरह यूपीआई में भी संचालन लागत आती है।

Desh Raj
Desh Raj
Please wait....

Read more

Related News