Shimla News: हिमाचल प्रदेश उच्च न्यायालय ने किसी अन्य व्यक्ति द्वारा लिए गए ऋण के एवज में गारंटर बने अपने कर्मचारी का वेतन कुर्क करने के मामले में राज्य सहकारी बैंक की किसी भी दंडात्मक कार्रवाई पर रोक लगा दी है। न्यायालय ने तल्ख टिप्पणी करते हुए कहा कि जब वसूली कार्यवाही के खिलाफ दायर अपील सक्षम प्राधिकारी के समक्ष लंबित थी, तब संबंधित अधिकारियों को संयम बरतना चाहिए था।
न्यायमूर्ति संदीप शर्मा की एकल पीठ ने याचिकाकर्ता पुनीत नेगी द्वारा हिमाचल प्रदेश राज्य सहकारी बैंक लिमिटेड एवं अन्य उत्तरदाताओं के विरुद्ध दायर याचिका का निस्तारण करते हुए यह आदेश पारित किया। उच्च न्यायालय ने अपर रजिस्ट्रार (निगरानी), सहकारी समितियां, हिमाचल प्रदेश को निर्देश दिया है कि वे 31 मार्च 2026 के फैसले के खिलाफ लंबित अपील पर प्राथमिकता के आधार पर दो महीने के भीतर अंतिम निर्णय लें। अदालत ने स्पष्ट किया कि अपील के निस्तारण तक याचिकाकर्ता के खिलाफ वेतन कटौती या कोई अन्य दंडात्मक कदम न उठाया जाए।
गारंटर बनने पर शुरू हुई थी वेतन कुर्की की प्रक्रिया
मामले के अनुसार, याचिकाकर्ता पुनीत नेगी ने एक अन्य व्यक्ति के लिए गारंटर (जमानती) के रूप में भूमिका निभाई थी, जिसने बैंक से ऋण लिया था। मूल उधारकर्ता द्वारा ऋण चुकाने में चूक करने के बाद बैंक ने दोनों के खिलाफ वसूली की प्रक्रिया शुरू कर दी। इसी कड़ी में सहकारी बैंक के कलेक्टर (वसूली) ने 2 मई 2025 को आदेश जारी कर नेगी के वेतन को कुर्क करने का निर्देश दिया था।
इस कार्रवाई के खिलाफ याचिकाकर्ता ने हिमाचल प्रदेश सहकारी समिति अधिनियम, 1968 की धारा 72 और 73 के तहत सक्षम प्राधिकारी के समक्ष मध्यस्थता याचिका दायर की, जो 31 मार्च 2026 को खारिज कर दी गई। इसके बाद नेगी ने आदेश को चुनौती देते हुए अपर रजिस्ट्रार (निगरानी) के समक्ष अपील दायर की, जो वर्तमान में विचाराधीन है।
रोक हटने पर 40,000 रुपये मासिक कटौती का आया था आदेश
अपील लंबित रहने के दौरान अपीलीय प्राधिकारी ने 5 अगस्त 2026 को मामले की आगे की कार्यवाही को एक अन्य रिट याचिका का फैसला आने तक स्थगित कर दिया, लेकिन वेतन कुर्की पर लगी अंतरिम रोक हटा ली। रोक हटते ही कलेक्टर (वसूली) ने 13 अक्टूबर 2026 को संशोधित आदेश जारी करते हुए याचिकाकर्ता के वेतन से प्रतिमाह 40,000 रुपये काटने के निर्देश जारी कर दिए।
इस आदेश से व्यथित होकर नेगी ने उच्च न्यायालय की शरण ली और अपील के निपटारे तक सुरक्षा की मांग की।
“अपील लंबित होने पर संयम बरतना जरूरी था”
सुनवाई के दौरान बैंक के अधिवक्ता ने इस बात पर सहमति जताई कि अपीलीय प्राधिकारी को निश्चित समय सीमा के भीतर निर्णय लेने का निर्देश दिया जा सकता है और तब तक कुर्की आदेश पर रोक रह सकती है।
उच्च न्यायालय ने अपने आदेश में रेखांकित किया कि चूंकि याचिकाकर्ता पहले ही कानूनी रूप से सक्षम अपीलीय प्राधिकारी के समक्ष जा चुका था, ऐसे में अधिकारियों को अंतिम फैसला आने तक संयम बरतना चाहिए था। इसके साथ ही न्यायालय ने यह भी स्पष्ट किया कि उसने विवाद के गुण-दोष (मेरिट्स) पर कोई टिप्पणी नहीं की है और प्राधिकारी स्वतंत्र रूप से दो माह में निर्णय लें।