स्थानीय निकाय चुनावों में दो बच्चों की नीति पर सुप्रीम कोर्ट ने उठाए सवाल, मामला बड़ी बेंच को भेजा

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New Delhi News: सुप्रीम कोर्ट ने स्थानीय निकाय चुनावों में दो से अधिक बच्चे होने पर उम्मीदवारी रद्द करने वाले कानूनों की प्रासंगिकता पर सवाल उठाए हैं। अदालत ने देश की घटती प्रजनन दर का हवाला देते हुए 2003 के फैसले पर पुनर्विचार के लिए मामला बड़ी बेंच को भेज दिया है। साथ ही महाराष्ट्र की पूर्व सरपंच की अयोग्यता भी रद्द कर दी।

सुप्रीम कोर्ट ने देश में घटती प्रजनन दर का हवाला देते हुए स्थानीय निकाय चुनाव लड़ने के लिए दो बच्चों की अनिवार्य शर्त वाले कानूनों की प्रासंगिकता पर गंभीर सवाल खड़े किए हैं। अदालत ने कहा कि भारत में कुल प्रजनन दर (TFR) घटकर 1.9 रह गई है। ऐसे में जनसंख्या वृद्धि के डर के आधार पर बनाए गए नियम मौजूदा समय में अपना आधार खो रहे हैं। इस टिप्पणी के साथ जस्टिस पीएस नरसिम्हा और जस्टिस आलोक अराधे की पीठ ने 2003 के जावेद बनाम हरियाणा राज्य मामले में दिए गए ऐतिहासिक फैसले पर पुनर्विचार के लिए मामला बड़ी पीठ (लार्जर बेंच) को सौंप दिया है।

शीर्ष अदालत ने यह आदेश महाराष्ट्र के काकोड़ा ग्राम पंचायत की पूर्व सरपंच मंगला भीमराव की याचिका पर सुनवाई करते हुए दिया। मंगला को महाराष्ट्र ग्राम पंचायत अधिनियम 1959 की धारा 14(1)(j-1) के तहत तीसरे बच्चे के जन्म के कारण अयोग्य घोषित कर दिया गया था। बॉम्बे हाईकोर्ट ने 5 अगस्त 2025 को उनकी अयोग्यता बरकरार रखी थी, जिसे अब सुप्रीम कोर्ट ने रद्द करते हुए उन्हें राहत प्रदान की है। हालांकि, अदालत ने स्पष्ट किया है कि देशभर में यह शर्त अभी पूरी तरह समाप्त नहीं हुई है और इस पर अंतिम निर्णय बड़ी पीठ द्वारा ही लिया जाएगा।

2003 का जावेद बनाम हरियाणा मामला

साल 2003 में सुप्रीम कोर्ट की तीन जजों की पीठ ने जावेद बनाम हरियाणा राज्य मामले की सुनवाई करते हुए हरियाणा पंचायती राज अधिनियम 1994 के दो-बच्चे वाले प्रावधान को संवैधानिक रूप से वैध ठहराया था। उस समय अदालत ने माना था कि जनसंख्या नियंत्रण के उद्देश्य से दो से अधिक जीवित बच्चे होने पर पंचायत चुनाव लड़ने से रोकना उचित है। अब वर्तमान पीठ ने बदलती जनसांख्यिकी और सामाजिक वास्तविकताओं को देखते हुए इस व्यवस्था की नए सिरे से न्यायिक समीक्षा की आवश्यकता बताई है।

प्रजनन स्वायत्तता और लोकतांत्रिक भागीदारी पर प्रभाव

अदालत ने सुनवाई के दौरान कहा कि ऐसे प्रतिबंध नागरिकों के एक बड़े वर्ग को राजनीतिक और लोकतांत्रिक प्रतिनिधित्व से वंचित कर सकते हैं। पीठ ने टिप्पणी की कि दो बच्चों की सीमा का किसी व्यक्ति की सार्वजनिक पद संभालने की योग्यता या प्रशासनिक क्षमता से कोई सीधा संबंध साबित नहीं होता। इसके अलावा, ऐसे नियम लोगों को संतान उत्पत्ति और लोकतांत्रिक प्रक्रिया में भागीदारी के बीच एक कठिन विकल्प चुनने पर मजबूर करते हैं, जो सीधे तौर पर संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत प्राप्त व्यक्तिगत स्वतंत्रता और प्रजनन स्वायत्तता के अधिकारों से जुड़ा विषय है।

राज्यों में नीतियों की स्थिति

मामले की सुनवाई के दौरान राज्यों में लागू विभिन्न नियमों का ब्योरा भी अदालत के सामने रखा गया। उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार, देश के सात राज्य स्थानीय चुनावों से दो बच्चों की शर्त को समाप्त कर चुके हैं, जबकि 15 राज्यों में ऐसी कोई पाबंदी कभी लागू नहीं रही। वहीं असम, गोवा, गुजरात, महाराष्ट्र, ओडिशा और उत्तराखंड जैसे राज्यों में यह प्रावधान अब भी प्रभावी है। सुप्रीम कोर्ट की बड़ी बेंच का फैसला आने के बाद ही देशभर में इन असमान कानूनी प्रावधानों की अंतिम स्थिति स्पष्ट हो सकेगी।

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