Vidisha: विदिशा में 1100 साल पुराने रॉक-कट जैन मंदिर को सहेजेगा ASI, पत्थरों को खोलकर नए चबूतरे पर किया जाएगा पुनर्स्थापित

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Vidisha News: मध्य प्रदेश के विदिशा जिले में स्थित प्रतिहार कालीन 1100 वर्ष पुराने रॉक-कट जैन मंदिर के संरक्षण के लिए भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (ASI) ने ऐतिहासिक पहल की है। जर्जर हो चुके चबूतरे के कारण मंदिर के पत्थरों को वैज्ञानिक पद्धति से पूरी तरह खोलकर नए प्लेटफॉर्म पर दोबारा स्थापित किया जाएगा। दो साल से अधिक समय तक चलने वाले इस पुनरुद्धार कार्य की रूपरेखा तैयार कर ली गई है।

मध्य प्रदेश के विदिशा जिले में एक पहाड़ी पर स्थित लगभग 1100 साल पुराने रॉक-कट जैन मंदिर को सुरक्षित रखने के लिए भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (एएसआई) ने व्यापक संरक्षण योजना शुरू की है। वर्षों से आम पर्यटकों के लिए बंद इस प्रतिहार कालीन ऐतिहासिक स्मारक के संरक्षण का पहला प्रयास वर्ष 1930 में ग्वालियर रियासत के दौर में हुआ था, लेकिन तब यह कार्य पूरा नहीं हो सका था। अब एएसआई पत्थरों की मरम्मत कर मंदिर को नए आधार चबूतरे पर पुनर्जीवित करेगा।

डिजिटल मैपिंग पूरी, पत्थरों की कोडिंग के बाद खुलेगा ढांचा

एएसआई के महानिदेशक यदुवीर सिंह रावत के अनुसार, मंदिर के विस्तृत रेखाचित्र और तकनीकी ड्राइंग तैयार किए जा चुके हैं। मंदिर के प्रत्येक पत्थर और उस पर उकेरी गई बारीक नक्काशी की पहचान कर उन्हें डिजिटल और हस्तलिखित रिकॉर्ड में दर्ज किया जा रहा है।

वर्तमान चबूतरा अत्यंत कमजोर और क्षत-विक्षत हो चुका है, इसलिए मूल संरचना को गिरने से बचाने के लिए पहले एक नया सपोर्टिंग प्लेटफॉर्म तैयार किया जा रहा है। इसके बाद वैज्ञानिक पाड़ (स्कैफोल्डिंग) बनाकर मंदिर को बेहद सावधानीपूर्वक एक-एक पत्थर कर खोला जाएगा, ताकि किसी भी पुरातात्विक कलाकृति को नुकसान पहुंचाए बिना उसे मूल स्थान पर दोबारा लगाया जा सके।

गहरी खाई के बीच भोपाल मंडल की 12 सदस्यीय टीम कर रही काम

इस जटिल और संवेदनशील परियोजना की जिम्मेदारी अधीक्षण पुरातत्वविद् शिवकांत वाजपेयी के नेतृत्व में एएसआई भोपाल मंडल को सौंपी गई है, जिसमें 12 विशेषज्ञों की कोर टीम काम कर रही है। मंदिर के चारों ओर गहरी खाई होने और कार्य स्थल सीमित होने के कारण भारी पत्थरों को सुरक्षित निकालना और नया ढांचा तैयार करना तकनीकी रूप से काफी चुनौतीपूर्ण बना हुआ है।

9वीं सदी के शिलालेख और प्रतिहार स्थापत्य का अद्भुत संगम

इस मंदिर का ऐतिहासिक संबंध ग्यारसपुर क्षेत्र के कलचुरि राज्यपाल वल्लक (850-885 ईस्वी) के काल से है, जिसका एक दुर्लभ शिलालेख वर्तमान में ब्रिटिश संग्रहालय में सुरक्षित है। यह मंदिर आंशिक रूप से प्राकृतिक चट्टान को तराशकर और पत्थरों को जोड़कर बनाया गया है, जो पहाड़ी से बाहर उभरता हुआ दिखाई देता है। इसमें प्रवेश द्वार, गर्भगृह और भव्य शिखर मौजूद हैं।

मंदिर की दीवारों और आलों में प्रतिहार शैली की दुर्लभ मूर्तियां उकेरी गई हैं। इनमें हिरण के लांछन के साथ पद्मासन मुद्रा में विराजित 16वें तीर्थंकर भगवान शांतिनाथ, 9वीं शताब्दी की भगवान पार्श्वनाथ की प्रतिमा, यक्ष-यक्षी तथा प्रथम तीर्थंकर ऋषभदेव की शासन देवी चक्रेश्वरी की नक्काशीदार प्रतिमाएं शामिल हैं। यह स्मारक पूर्व-मध्यकालीन भारत की उत्कृष्ट स्थापत्य और जैन धार्मिक परंपरा का अद्वितीय प्रमाण है।

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