भारतीय रिजर्व बैंक ने रेपो रेट में 25 बेसिस प्वाइंट की बढ़ोतरी की, बढ़कर 5.50 फीसदी हुई ब्याज दरें

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Mumbai News: भारतीय रिजर्व बैंक ने ब्याज दरों को लेकर बड़ा निर्णय लेते हुए रेपो रेट में 0.25 फीसदी की बढ़ोतरी की है। इस फैसले के बाद रेपो रेट 5.25 फीसदी से बढ़कर 5.50 फीसदी हो गया है। आरबीआई गवर्नर संजय मल्होत्रा ने मौद्रिक नीति समिति के इस निर्णय का ऐलान किया।

बढ़ती महंगाई और महंगे कच्चे तेल की चुनौती से निपटने के लिए आरबीआई ने यह कदम उठाया है। अगस्त में खुदरा महंगाई बढ़कर 4.82 फीसदी हो गई थी। इसके साथ ही अंतरराष्ट्रीय बाजार में ब्रेंट क्रूड 107 डॉलर प्रति बैरल के पार पहुंच गया, जिससे देश का आयात बिल बढ़ने का खतरा है।

रेपो रेट वह दर है जिस पर आरबीआई बैंकों को कर्ज उपलब्ध कराता है। जब रेपो रेट बढ़ता है तो बैंकों के लिए फंड जुटाना महंगा हो जाता है। इसका सीधा असर बैंकों की लोन दरों पर पड़ेगा। हालांकि, हर ग्राहक की ईएमआई तुरंत 0.25 फीसदी नहीं बढ़ेगी, यह बैंक के फैसलों पर निर्भर करेगा।

फ्लोटिंग रेट वाले होम लोन ग्राहकों पर इस फैसले का सबसे अधिक असर पड़ सकता है। अगर बैंक अपनी दरें बढ़ाते हैं तो ईएमआई बढ़ जाएगी या लोन की अवधि लंबी होगी। नए घर की योजना बना रहे लोगों के लिए भी लोन महंगा हो जाएगा। लोन की राशि और बची अवधि के हिसाब से असर अलग-अलग रहेगा।

रेपो रेट बढ़ने का असर कार लोन और पर्सनल लोन पर भी पड़ेगा। बैंक दरों में बढ़ोतरी करेंगे तो कर्ज की लागत बढ़ेगी। महंगे इलेक्ट्रॉनिक्स और गाड़ियों के लिए फ्लोटिंग रेट पर कर्ज लेने वाले लोगों का कुल भुगतान बढ़ जाएगा। इससे कई ग्राहक खरीदारी को आगे के लिए टाल सकते हैं।

कर्ज महंगा होने के साथ ही फिक्स्ड डिपॉजिट यानी एफडी कराने वाले ग्राहकों को फायदा मिल सकता है। अगर बैंक आने वाले दिनों में जमा दरों में बढ़ोतरी करते हैं, तो बचत करने वालों को ज्यादा ब्याज मिलेगा। हालांकि, सभी बैंक अपनी फंड की जरूरत के हिसाब से अलग-अलग दरें तय करेंगे।

शेयर बाजार पर भी इस निर्णय का सीधा असर देखने को मिल सकता है। बैंकिंग, ऑटो और रियल एस्टेट जैसे सेक्टर्स इस पर प्रतिक्रिया देंगे। कंपनियों के लिए कर्ज महंगा होने से उनके मुनाफे पर दबाव आ सकता है। बाजार के लिए गवर्नर संजय मल्होत्रा की आगामी टिप्पणियां काफी महत्वपूर्ण होंगी।

बैंक ऑफ बड़ौदा के मुख्य अर्थशास्त्री मदन सबनवीस ने अनुमान जताया था कि आगे भी ब्याज दरें बढ़ सकती हैं और रेपो रेट 6 फीसदी तक पहुंच सकता है। चूंकि अक्टूबर में ही दरें बढ़ चुकी हैं, इसलिए आगे का फैसला महंगाई, कच्चे तेल की कीमतों और रुपये की चाल पर निर्भर करेगा।

आरबीआई का मुख्य उद्देश्य महंगाई को अपने 4 फीसदी के लक्ष्य के भीतर रखना है। कच्चा तेल महंगा होने से ट्रांसपोर्टेशन और उत्पादन लागत बढ़ती है, जिससे समग्र महंगाई पर दबाव पड़ता है। इसीलिए केंद्रीय बैंक का यह फैसला सिर्फ ईएमआई तक सीमित नहीं है, बल्कि पूरी अर्थव्यवस्था से जुड़ा है।

आम लोगों पर इस फैसले का मिला-जुला असर दिखेगा। कर्ज लेने वालों की ईएमआई या लोन की समय सीमा बढ़ सकती है, जिससे जेब पर बोझ बढ़ेगा। वहीं, एफडी में निवेश करने वाले आम नागरिकों को जमा पर अधिक ब्याज मिलने की उम्मीद है, जिससे बचत पर बेहतर रिटर्न मिल सकता है।

आने वाले महीनों में बाजार की नजर महंगाई दर, क्रूड ऑयल की कीमत और रुपये के स्तर पर रहेगी। अगर महंगाई का दबाव जारी रहता है तो आरबीआई सख्त रुख बरकरार रख सकता है। रेपो रेट 5.50 फीसदी होने के बाद अब बैंकों के नए कदमों पर सबकी निगाहें टिकी हैं।

Mohit
Mohit
पत्रकारिता के क्षेत्र में 9 सालों का अनुभव।

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