देश के उच्च न्यायालयों में 65 लाख से अधिक मुकदमे लंबित, सुनवाई की तारीख के लिए सुप्रीम कोर्ट पहुंचे पीड़ित

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New Delhi News: भारतीय न्यायपालिका में मुकदमों के लंबे इंतजार और बढ़ते मामलों को लेकर गंभीर स्थिति सामने आई है। देश के विभिन्न उच्च न्यायालयों में 65 लाख से अधिक मामले लंबित पड़े हैं। इसके चलते आम नागरिकों को न्याय पाने के लिए दशकों तक कानूनी लड़ाई लड़नी पड़ रही है।

राजस्थान के जालोर जिले का मामला इस संकट की स्पष्ट तस्वीर दिखाता है। वहां के एक स्वास्थ्यकर्मी को 1999 में दैनिक वेतन भोगी पद से हटाया गया था। श्रम अदालत के निर्णय के खिलाफ उन्होंने वर्ष 2004 में राजस्थान उच्च न्यायालय में याचिका लगाई थी, जिस पर 22 साल बाद भी सुनवाई पूरी नहीं हुई।

सुप्रीम कोर्ट ने हाईकोर्ट में आवेदन की दी छूट

लंबे इंतजार से परेशान होकर स्वास्थ्यकर्मी ने जल्द सुनवाई की मांग को लेकर सुप्रीम कोर्ट का रुख किया। मुख्य न्यायाधीश की अध्यक्षता वाली पीठ ने मामले पर विचार का ठोस आधार न पाते हुए याचिका खारिज कर दी। हालांकि शीर्ष अदालत ने याचिकाकर्ता को उच्च न्यायालय में जल्द सुनवाई का आवेदन करने की छूट दी।

आंकड़ों के मुताबिक इलाहाबाद हाईकोर्ट में सर्वाधिक लगभग 12.5 लाख मुकदमे पेंडिंग हैं, जहां जज प्रतिदिन 150 से 200 केस सुनते हैं। वहीं राजस्थान में करीब 7 लाख, बॉम्बे में 6.4 लाख, मद्रास में 5.6 लाख, मध्य प्रदेश में 4.9 लाख, कर्नाटक में 3.3 लाख और दिल्ली हाईकोर्ट में 1.2 लाख केस अटके हैं।

दस साल पुराने पंद्रह लाख मामलों से बढ़ा अदालतों पर दबाव

देश की अदालतों में करीब 15 लाख मामले ऐसे हैं, जो पिछले 10 वर्षों से अधिक समय से लंबित पड़े हैं। मुकदमों के इस भारी बोझ से त्वरित न्याय प्रणाली पर गहरा असर पड़ रहा है। अब लोग अंतिम फैसले के बजाय सिर्फ तारीख पाने के लिए सुप्रीम कोर्ट तक दौड़ लगाने को मजबूर हैं।

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