Technology News: सोशल मीडिया पर इन दिनों आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस की मदद से पुरानी ईयरबुक जैसी तस्वीरें बनाने का ट्रेंड तेजी से बढ़ रहा है। यूजर्स मनोरंजन के लिए बिना सोचे-समझे अपनी तस्वीरें अपलोड कर रहे हैं। साइबर सुरक्षा विशेषज्ञों के अनुसार यह हानिरहित दिखने वाला खेल यूजर्स की डिजिटल सुरक्षा के लिए गंभीर खतरा बन चुका है।
पारंपरिक फोटो फिल्टर केवल तस्वीर पर रंगों की परत जोड़ते थे, लेकिन नए जेनरेटिव एआई मॉडल चेहरे की ज्यामिति और पुतलियों को बारीकी से स्कैन करते हैं। इस प्रक्रिया में यूजर्स अनजाने में अपना संवेदनशील बायोमेट्रिक डेटा कंपनियों को सौंप देते हैं। पासवर्ड बदले जा सकते हैं, लेकिन चोरी हुआ बायोमेट्रिक डेटा कभी बदला नहीं जा सकता।
डीपफेक और वित्तीय धोखाधड़ी की बढ़ रही आशंका
अपलोड किए गए फेशियल डेटा का दुरुपयोग भविष्य में पहचान चुराने, फर्जी दस्तावेज तैयार करने या डीपफेक वीडियो बनाने में हो सकता है। इसके अलावा ट्रेंड लोकप्रिय होते ही प्ले स्टोर पर ढेरों फर्जी ऐप्स सक्रिय हो जाते हैं। ये ऐप्स गैलरी, कॉन्टैक्ट्स और लोकेशन की अनुमति लेकर वित्तीय डेटा और पासवर्ड तक चुरा लेते हैं।
तस्वीरों में मौजूद मेटाडेटा साइबर अपराधियों को घर की सटीक जीपीएस लोकेशन तक दे सकता है। इंटरनेट पर मुफ्त दिखने वाली सुविधाओं के जरिए कंपनियां यूजर्स का निजी डेटा विज्ञापनदाताओं को बेचती हैं। ट्रेंड कुछ समय में खत्म हो जाते हैं, लेकिन सर्वर पर स्टोर हुआ आपका निजी बायोमेट्रिक रिकॉर्ड कभी डिलीट नहीं होता।
डिजिटल सुरक्षा के लिए जरूरी सावधानियां
तकनीक के इस दौर में सुरक्षित रहने के लिए यूजर्स को एआई टूल्स की सेटिंग्स में जाकर मॉडल ट्रेनिंग विकल्प तुरंत बंद करना चाहिए। असली तस्वीर देने के बजाय टेक्स्ट लिखकर काल्पनिक चेहरे बनवाएं। इसके अलावा फोटो शेयर करने से पहले मेटाडेटा हटाएं और मोबाइल में गैर-जरूरी ऐप्स की परमिशन तुरंत रद्द करें।