Kolkata News: पश्चिम बंगाल सरकार के प्रस्तावित एंटी-गुंडा बिल को बड़ा झटका लगा है। राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू ने बिल पर हस्ताक्षर करने से इनकार कर दिया। उन्होंने इसे पुनर्विचार के लिए वापस भेज दिया है। केंद्र सरकार ने इस कानून के कुछ प्रावधानों पर केंद्रीय कानूनों के साथ संभावित टकराव की कड़ी आपत्ति दर्ज कराई थी।
केंद्रीय कानून से टकराव पर केंद्र ने जताई आपत्ति
केंद्र ने राष्ट्रपति को भेजे नोट में खास तौर पर एनडीपीएस एक्ट का जिक्र किया। प्रस्तावित बिल में गुंडा की परिभाषा में नशीले पदार्थों के तस्करों को शामिल किया गया था। केंद्र के अनुसार यह प्रावधान 1988 के पीआईटी-एनडीपीएस एक्ट से सीधे तौर पर टकराता है। यह केंद्रीय कानून ड्रग्स तस्करी रोकने के लिए पहले से लागू है।
गृह मंत्रालय ने आशंका जताई कि नए कानून से नशीले पदार्थों के मामलों में एक अलग व्यवस्था बन जाएगी। इससे संविधान के अनुच्छेद 254 के तहत केंद्र और राज्य के कानूनों में सीधा विवाद पैदा हो सकता है। इसी वजह से केंद्र सरकार ने बिल की धारा 2(d)(iii)(B) से एनडीपीएस से जुड़े सभी संदर्भ तुरंत हटाने की स्पष्ट सलाह दी है।
कानून लागू करने की कोशिशों को लगा बड़ा झटका
राज्य प्रशासन के एक वरिष्ठ अधिकारी ने राष्ट्रपति के इस कदम को सरकार के लिए झटका बताया है। अधिकारी ने स्पष्ट किया कि सरकार इस कानून को तुरंत लागू करना चाहती थी। हालांकि अब सरकार जरूरी संशोधन करके इसे दोबारा विधानसभा में पेश करेगी। संशोधन पारित होने के बाद इसे दोबारा राष्ट्रपति की अंतिम मंजूरी के लिए भेजा जाएगा।
पश्चिम बंगाल सरकार ने जून महीने में सार्वजनिक सुरक्षा और असामाजिक गतिविधि नियंत्रण विधेयक विधानसभा में पेश किया था। इसका मकसद असामाजिक तत्वों की गतिविधियों पर पूरी तरह लगाम लगाना था। विपक्ष के सवालों पर भाजपा नेता शुभेंदु अधिकारी ने भरोसा दिया था कि कानून का राजनीतिक इस्तेमाल नहीं होगा। बिल में असामाजिक गतिविधियों की विस्तृत परिभाषा तय की गई थी।
अधिकारियों को संदिग्धों को बाहर निकालने का अधिकार
प्रस्तावित बिल में जिला मजिस्ट्रेट, पुलिस कमिश्नर और डीआईजी रैंक के अधिकारियों को विशेष अधिकार दिए गए थे। ये अधिकारी किसी भी संदिग्ध व्यक्ति को चिन्हित इलाके से बाहर निकालने का आदेश दे सकते थे। ऐसे व्यक्ति को अधिकतम एक साल तक उस इलाके में लौटने से रोकने और तय समय पर पुलिस के सामने हाजिर होने का नियम था।
अगस्त महीने में कलकत्ता हाई कोर्ट की खंडपीठ ने इस बिल के खिलाफ दायर तीन जनहित याचिकाएं खारिज कर दी थीं। अदालत ने स्पष्ट किया था कि जब तक राष्ट्रपति की मंजूरी नहीं मिलती, यह केवल एक बिल है। कानून बनने के बाद ही इसकी वैधता को अदालत में चुनौती दी जा सकती है। इसलिए उस समय याचिकाएं समय से पहले मानी गईं।
इस मामले में शुभेंदु अधिकारी के दावों और सरकारी पक्ष में बड़ा अंतर देखने को मिला था। अधिकारी ने सार्वजनिक तौर पर दावा किया था कि बिल कानून बन चुका है। उन्होंने विरोध मार्च हिंसा मामले में इस एक्ट के इस्तेमाल की बात भी कही थी। लेकिन अदालत में सरकार ने स्वीकार किया कि बिल अभी राष्ट्रपति की मंजूरी का इंतजार कर रहा है।