Delhi News: विजयदशमी का त्योहार हमें सिखाता है कि बुराई कितनी भी साधन-संपन्न क्यों न हो, सत्य और धैर्य के बल पर अंत में विजय ही मिलती है। आधुनिक डिजिटल युग में भटकाव, सोशल मीडिया के फेक नैरेटिव और जीवन की आपाधापी से जूझ रहे युवाओं के लिए मर्यादा पुरुषोत्तम श्रीराम का पावन चरित्र सही मार्गदर्शन प्रदान करता है।
श्रीरामचरितमानस के लंका कांड में शौर्य और धैर्य को रथ का पहिया बताया गया है। आज के दौर में इंटरनेट मीडिया की अफवाहें, फेक न्यूज और भौतिक चमक-दमक युवाओं के मन में ईर्ष्या, तनाव और भय पैदा कर रहे हैं। ऐसे समय में किसी भी बुराई या प्रलोभन से समझौता किए बिना निरंतर सही राह पर चलना बेहद आवश्यक है।
सफलता के लिए कठिन तपस्या और अनुशासन है जरूरी
आज की पीढ़ी इंस्टेंट ग्रेटिफिकेशन की शिकार हो रही है, जहां सफलता रातों-रात पाने की चाहत रहती है। प्रभु श्रीराम ने चौदह वर्ष का कठोर वनवास अनुशासन और मर्यादा के साथ बिताया था। जीवन में शॉर्टकट की जगह तपस्या का रास्ता चुनना चाहिए, क्योंकि बिना कठिन अभ्यास और धैर्य के कोई भी व्यक्ति बड़ा लक्ष्य हासिल नहीं कर सकता।
अहंकार त्यागकर ज्ञान के साथ कौशल को अपनाएं युवा
दशहरे पर रावण दहन का मूल अर्थ अपने भीतर के काम, क्रोध, लोभ और अहंकार को समाप्त करना है। इसके साथ ही विजयदशमी शस्त्र पूजा के जरिए हमें सिखाती है कि केवल डिग्री काफी नहीं है, बल्कि कौशल में भी पारंगत होना पड़ेगा। टीम वर्क, विनम्रता और सही कौशल के मेल से ही जीवन में सच्ची विजय संभव है।
वर्तमान समय में युवाओं को शारीरिक, बौद्धिक और मानसिक रूप से मजबूत बनना होगा। स्क्रीन टाइम सीमित करके शरीर को स्वस्थ रखना जरूरी है। अनंत सूचनाओं में से सही तथ्य की पहचान करने वाला विवेक विकसित करना चाहिए। कठिन परिस्थितियों में अवसाद और अकेलेपन से लड़कर दृढ़ता के साथ खड़े रहने की मानसिक शक्ति ही असली विजय दिलाती है।
