Ranchi News: झारखंड हाई कोर्ट के जस्टिस दीपक रोशन की अदालत ने झारखंड सशस्त्र पुलिस (जैप)-8 के 14 जवानों को दी गई वेतन वृद्धि वापस लेने और अतिरिक्त राशि की एकमुश्त वसूली के राज्य सरकार के आदेश को निरस्त कर दिया है। अदालत ने बिना कारण बताओ नोटिस और पक्ष सुने बिना की गई कार्रवाई को अनुचित बताते हुए राज्य सरकार को आठ सप्ताह के भीतर सभी परिणामी लाभ देने का निर्देश दिया है।
झारखंड हाई कोर्ट ने झारखंड सशस्त्र पुलिस (जैप)-8 के 14 जवानों के पक्ष में महत्वपूर्ण फैसला सुनाते हुए राज्य सरकार और कमांडेंट द्वारा जारी वेतन वृद्धि वापसी तथा एकमुश्त रिकवरी के आदेश को रद्द कर दिया है। जस्टिस दीपक रोशन की एकलपीठ ने मामले की सुनवाई करते हुए स्पष्ट किया कि प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों के तहत जवानों को बिना कारण बताओ नोटिस जारी किए और उनका पक्ष सुने बिना वेतन वृद्धि वापस लेना और वसूली का आदेश देना विधि सम्मत नहीं है।
कमांडेंट के संशोधित आदेश को अदालत में दी गई थी चुनौती
मामले के अनुसार, जैप-8 के 14 जवानों को 1 अप्रैल 2021 को एक आदेश के माध्यम से वेतन वृद्धि का लाभ प्रदान किया गया था। हालांकि, बाद में कमांडेंट की ओर से 11 दिसंबर 2023 को एक संशोधित आदेश जारी करते हुए जवानों की वेतन वृद्धि वापस ले ली गई और उन्हें दिए गए अतिरिक्त भुगतान की राशि एकमुश्त वसूलने का फरमान जारी किया गया। इस आदेश के खिलाफ जवानों ने हाई कोर्ट का दरवाजा खटखटाया था।
याचिकाकर्ताओं की ओर से अधिवक्ता सिद्धार्थ रंजन ने अदालत में दलील दी कि पूर्व में भी इसी तरह के मामले में हाई कोर्ट ने वर्ष 2016 और 2017 में जारी बर्खास्तगी आदेशों को निरस्त कर दिया था। उस समय अदालत ने सभी जवानों को मूल पद पर बहाल करने और समस्त परिणामी लाभ देने का आदेश दिया था, जिसे राज्य सरकार ने चुनौती नहीं दी थी। इसके आधार पर जवानों को वेतन वृद्धि दी गई थी, जिसे बाद में बिना किसी पूर्व सूचना या नोटिस के मनमाने ढंग से वापस ले लिया गया।
सरकार की दलील और अदालत का निष्कर्ष
राज्य सरकार की ओर से ‘नो वर्क, नो पे’ का सिद्धांत लागू करने का तर्क दिया गया। सरकार ने झारखंड सेवा संहिता के नियम 85(ख) का हवाला देते हुए कहा कि बर्खास्तगी की अवधि को असाधारण अवकाश माना गया था, जिसे वेतन वृद्धि के लिए सेवा अवधि में नहीं गिना जा सकता।
दोनों पक्षों की दलीलें सुनने के बाद अदालत ने कहा कि जब पूर्व के आदेश में सभी परिणामी लाभ देने का स्पष्ट निर्देश था और सरकार ने उसे स्वीकार कर वेतन वृद्धि दे दी थी, तो लंबे समय बाद बिना ‘कारण बताओ नोटिस’ दिए इसे वापस नहीं लिया जा सकता। अदालत ने किसी भी प्रशासनिक निर्णय से पूर्व प्रभावित पक्ष को सुनवाई का अवसर देना अनिवार्य बताते हुए राज्य सरकार को आठ सप्ताह के भीतर सभी परिणामी लाभ प्रदान करने का आदेश दिया।