Delhi News: सुप्रीम कोर्ट ने हिमाचल प्रदेश के अनुबंध कर्मचारियों के पक्ष में बड़ा फैसला सुनाया है। अदालत ने कर्मचारी सेवा शर्तें अधिनियम को रद्द करने वाले हाईकोर्ट के आदेश पर मुहर लगा दी है। राज्य सरकार की विशेष अनुमति याचिका (एसएलपी) खारिज हो गई है।
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि वह हाईकोर्ट के आदेश में कोई दखल नहीं देना चाहता। राज्य के एडवोकेट जनरल ने फैसले को लागू करने के लिए समय देने की मांग की थी। इसे देखते हुए शीर्ष अदालत ने सरकार को आदेश का पालन करने के लिए चार महीने का समय दिया है।
हिमाचल प्रदेश हाईकोर्ट ने कानून को ठहराया था असंवैधानिक
इससे पहले हाईकोर्ट ने कर्मचारियों के अधिकारों की रक्षा करते हुए ऐतिहासिक फैसला दिया था। अदालत ने ‘हिमाचल प्रदेश सरकारी कर्मचारी भर्ती और सेवा शर्तें अधिनियम, 2024’ (2025 का अधिनियम 23) को असंवैधानिक, अवैध और शून्य घोषित कर दिया था।
जस्टिस विवेक सिंह ठाकुर और जस्टिस रोमेश वर्मा की बेंच ने देविंदर कुमार एवं अन्य की 260 से अधिक याचिकाओं पर यह फैसला सुनाया था। अदालत ने सरकार के इस कदम को न्यायिक फैसलों को पलटने का अनुचित प्रयास और शक्तियों के पृथक्करण का सीधा उल्लंघन माना था।
पुराने न्यायिक फैसलों और सरकार के नए अधिनियम का विवाद
राज्य में अनुबंध और अस्थाई कर्मचारियों को लेकर लंबी कानूनी लड़ाई चल रही थी। सर्वोच्च न्यायालय और उच्च न्यायालय ने शीला देवी, ताज मोहम्मद और लेख राम मामलों में स्पष्ट किया था कि पारदर्शी भर्ती से आए संविदा कर्मचारियों की सेवा अवधि को वरिष्ठता और पेंशन के लिए गिना जाना चाहिए।
वित्तीय दबाव से बचने के लिए राज्य सरकार ने विधानसभा से नया सेवा अधिनियम पारित करवाया, जिसे 7 फरवरी 2025 को राज्यपाल की मंजूरी मिली। सरकार ने इस कानून को बैकडेट से लागू किया और संविदा नियुक्तियों को सार्वजनिक सेवाओं के दायरे से बाहर कर दिया था।
इस अधिनियम के जरिए कर्मचारियों के अदालती लाभों को रोकने की तैयारी की गई थी। इसके विरोध में देविंदर कुमार समेत सैकड़ों कर्मचारियों ने याचिकाएं दायर की थीं। अब सुप्रीम कोर्ट के फैसले से हजारों संविदा कर्मचारियों को उनका हक मिलने का रास्ता पूरी तरह साफ हो गया है।