Shimla News: नेपाल में ग्लेशियर झील फटने से मची भारी तबाही के बाद पड़ोसी राज्य हिमाचल प्रदेश में खतरे की घंटी बज गई है। प्राकृतिक आपदाओं के लिहाज से संवेदनशील हिमाचल में लोग सहमे हुए हैं। अतीत में भी राज्य ऐसी त्रासदियां झेल चुका है। इतिहास गवाह है कि ग्लेशियर झीलों के टूटने से यहां नदियों में सुनामी जैसी बाढ़ आ चुकी है।
साल 2000 में सतलुज बेसिन में तिब्बत की तरफ ग्लेशियर झील फटने से अचानक फ्लैश फ्लड आया था। नदी का जलस्तर सामान्य से लगभग 60 फुट ऊपर पहुंच गया था। इस आपदा में नेशनल हाईवे-22 का 200 किलोमीटर हिस्सा बह गया था। 20 बड़े पुल तबाह हुए और 185 लोगों की जान गई थी। राज्य को 1,466 करोड़ का नुकसान हुआ था।
इसके बाद 26 जून 2005 को तिब्बत स्थित पारछू झील का प्राकृतिक बांध टूटा था। लाखों क्यूसेक पानी और मलबा किन्नौर और शिमला जिलों में घुस गया था। वांगतू से समदो के बीच एनएच-22 का 10 किलोमीटर हिस्सा बह गया था। दस कंक्रीट के पुल और 11 रोपवे पलक झपकते ही तबाह हो गए थे। हालांकि, समय पर अलर्ट से जनहानि टल गई थी।
हिमाचल की सतलुज घाटी में क्यों मंडरा रहा है नया खतरा
मुख्यमंत्री सुखविंदर सिंह सुक्खू ने विधानसभा में इसे हिमालयी क्षेत्र में गहराता क्लाइमेट क्राइसिस बताया है। हिमकोस्ट के सेटेलाइट अध्ययन के अनुसार सतलुज बेसिन में 2,292 ग्लेशियल झीलें मौजूद हैं। लाहौल-स्पीति की गीपनगाथ झील का दायरा 27 हेक्टेयर से बढ़कर 110 हेक्टेयर हो चुका है। इनमें से 1,335 झीलें तिब्बत में हैं, जहां भारत का कोई सीधा नियंत्रण नहीं है।
एनडीएमए ने वासुकी, गीपनगाथ, वास्पा और कलका झीलों को बेहद संवेदनशील माना है। खतरे को देखते हुए हिमकोस्ट, इसरो और एनडीएमए 24 घंटे सेटेलाइट से झीलों की मॉनिटरिंग कर रहे हैं। संवेदनशील क्षेत्रों में अर्ली वार्निंग सिस्टम लगाए जा रहे हैं। जुलाई-अगस्त 2023 की बारिश और बादल फटने से भी राज्य ने 500 से अधिक जानें गंवाई थीं।