Shimla News: हिमाचल प्रदेश हाईकोर्ट ने कर्मचारियों के अनुशासनिक मामलों में एक अहम फैसला सुनाते हुए साफ किया है कि बिना वजह बताए दी गई सजा कानूनन सही नहीं है। अदालत के अनुसार हर दंडात्मक आदेश में कारण लिखना अनिवार्य है। तर्क ही ऐसे फैसलों की आत्मा होते हैं।
मामला हिमाचल पथ परिवहन निगम से जुड़े वरिष्ठ स्टोर कीपर खेम सिंह का है। कुल्लू यूनिट में तैनाती के दौरान उन पर डीजल हेराफेरी और फर्जी बिल बनाने के आठ आरोप लगे थे। वर्ष 2019 में जांच पूरी होने के बाद 5 मई 2021 को उन्हें पद से हटा दिया गया।
डिवीजनल मैनेजर ने खेम सिंह को पदावनत करके पेट्रोल पंप अटेंडेंट बना दिया था। साथ ही उनसे 2.57 लाख रुपये से अधिक की वसूली का आदेश भी दिया गया। विभाग में अपील खारिज होने के बाद पीड़ित कर्मचारी ने इंसाफ के लिए हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाने का फैसला किया।
सुनवाई के दौरान हाईकोर्ट ने रिकॉर्ड जांचकर पाया कि आदेश में आरोपों पर कोई स्पष्ट टिप्पणी नहीं थी। कर्मचारी की आपत्तियों को भी खारिज करने का कोई ठोस कारण दर्ज नहीं किया गया था। बिना आधार बताए सीधे सजा सुना देना कानूनी प्रक्रियाओं के पूरी तरह खिलाफ माना गया।
अदालत ने कहा कि करियर और अधिकारों को प्रभावित करने वाले फैसलों में स्पष्टता जरूरी है। बिना कारण बताए कर्मचारी यह नहीं समझ सकता कि फैसला किस आधार पर हुआ। इन कमियों के चलते हाईकोर्ट ने पदावनति और 2.57 लाख रुपये वसूली के आदेश को तुरंत रद्द कर दिया।