समकालीन हिंदी कविता में हिमाचल के कवि डॉ. कुमार कृष्ण की रचनाओं का बढ़ा कद, समीक्षा श्रृंखला में साहित्यकारों ने सराहा

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Shimla News: ‘समकालीन कविता का हिमाचली परिदृश्य’ श्रृंखला की पांचवीं किश्त में शोघी के वरिष्ठ कवि डॉ. कुमार कृष्ण की रचनाधर्मिता पर विस्तार से चर्चा की गई है। समीक्षक सतीश धर के अनुसार, कुमार कृष्ण की कविताओं में ग्रामीण बोध, प्रतिरोध और संघर्ष की आग के साथ गहरी मानवीय संवेदनाएं मौजूद हैं।

वर्ष 1983 में ‘डरी हुई जमीन’ से अपनी पहचान बनाने वाले कुमार कृष्ण का 13वां संग्रह ‘गुल्लक में बाजार के पांव’ वर्ष 2025 में प्रकाशित हुआ। उनकी चर्चित कविताओं में ‘शब्द का निर्णय’, ‘पहाड़ और धूप का नया साल’, ‘सेब’ और ‘सड़क पर बैल’ शामिल हैं, जो पर्यावरण विनाश और बाजारवाद पर सवाल उठाती हैं।

कविता ‘शब्द का निर्णय’ में सच्चा शब्द अन्याय और सत्ता से आंख न चुराकर संघर्ष का रास्ता चुनता है। वहीं ‘पहाड़ और धूप का नया साल’ में पहाड़ को एक जीवित पात्र के रूप में दिखाया गया है, जिसे बाजार डायनामाइट से तबाह कर देता है। धूप उसकी साक्षी बनकर दुख व्यक्त करती है।

उनकी ‘सेब’ कविता किसान के श्रम, आंधी-तूफान के संघर्ष और बाजार के भय को उजागर करती है। इसी तरह ‘सड़क पर बैल’ कविता के माध्यम से बेदखल होते मां-बाप, किसान की असुरक्षा और आवारा मवेशियों की लाचार स्थिति पर तीखा सामाजिक सवाल उठाया गया है। यह कविता व्यवस्था की संवेदनहीनता को कटघरे में खड़ा करती है।

हिमाचल प्रदेश विश्वविद्यालय के हिंदी विभाग से विभागाध्यक्ष पद से सेवानिवृत्त डॉ. कुमार कृष्ण का जन्म 30 जून 1951 को शिमला के नागड़ी गांव में हुआ था। उनके चार आलोचना ग्रंथ और ‘हिमाचल वांग्मय’ जैसे कार्य प्रकाशित हो चुके हैं। वर्ष 1991 में उन्हें जन कवि सम्मान मिला था।

साहित्यकार प्रियंवदा पांडेय, सुदर्शन वशिष्ठ और शरत ने कुमार कृष्ण की कविताओं में बिंबों के सटीक प्रयोग और लोक चेतना की तारीफ की है। उनके अनुसार ये कविताएं पाठक को अपनी ओर खींचने के साथ मानवीय मूल्यों और लोक संस्कृति की रक्षा की नई राह दिखाती हैं।

Mohit
Mohit
पत्रकारिता के क्षेत्र में 9 सालों का अनुभव।

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