Shimla News: हिमाचल प्रदेश में जहर मुक्त प्राकृतिक खेती का अभियान रंग लाने लगा है। प्राकृतिक खेती खुशहाल किसान योजना के विस्तार से रासायनिक उर्वरकों की खपत 5 वर्षों में 13.15 प्रतिशत घटी है। वर्ष 2020-21 में 1.34 लाख टन रासायनिक खाद की खपत 2025-26 में घटकर 1,16,471 टन रह गई है।
प्रदेश के 9.60 लाख किसान परिवारों में से 2.52 लाख परिवार प्राकृतिक खेती अपना चुके हैं। वर्तमान में 54,742 हेक्टेयर भूमि पर प्राकृतिक खेती हो रही है। जुलाई 2026 तक 3,00,728 किसानों को प्रशिक्षण दिया जा चुका है और 3,584 पंचायतें इससे जुड़ चुकी हैं। अब 50 हजार नए परिवारों को जोड़ने का लक्ष्य है।
कृषि क्षेत्र में बड़ा बदलाव न होने के बावजूद रसायनों का इस्तेमाल तेजी से कम हुआ है। खरीफ क्षेत्र 2022-23 के 3.41 लाख हेक्टेयर से बढ़कर 2025-26 में 3.42 लाख हेक्टेयर और रबी क्षेत्र 3.51 से बढ़कर 3.55 लाख हेक्टेयर हुआ। इस दौरान रासायनिक खाद की खपत 1.30 लाख टन से घटकर 1.16 लाख टन रह गई।
किसानों का रुझान पारंपरिक फसलों से अधिक मूल्य वाली वाणिज्यिक और बागवानी फसलों की ओर बढ़ा है। प्राकृतिक खेती को बाजार से जोड़ने के लिए सीईटीएआरए-एनएफ प्रणाली के तहत 2,10,440 किसानों को प्रमाणपत्र जारी किए जा चुके हैं। प्रमाणित उत्पादों को बेहतर बाजार और उचित मूल्य दिलाने के लगातार प्रयास किए जा रहे हैं।
सरकार ने प्राकृतिक खेती को प्रोत्साहन देने के लिए गेहूं और पांगी के जौ का ₹80, मक्की का ₹50, हल्दी का ₹150 और अदरक का ₹30 प्रति किलो एमएसपी तय किया है। सरकार के इस कदम से किसानों का रुझान प्राकृतिक खेती की ओर तेजी से बढ़ा है, जिससे उनकी आय में सुधार हो रहा है।
मंडी जिले पर 2025 के अध्ययन में प्राकृतिक खेती की लागत परंपरागत खेती से काफी कम पाई गई। प्राकृतिक खेती की लागत ₹41,857 से ₹52,966 प्रति हेक्टेयर रही, जबकि परंपरागत खेती में यह ₹52,686 से ₹79,008 प्रति हेक्टेयर थी। बागवानों ने अपनी खेती की कुल लागत में 56.5 प्रतिशत तक की कमी दर्ज की है।
आंकड़ों के अनुसार रबी फसल क्षेत्र (लाख हेक्टेयर) 2022-23 में 3.51, 2023-24 में 3.49, 2024-25 में 3.52 और 2025-26 में 3.55 रहा। खरीफ फसल क्षेत्र 2022-23 में 3.41, 2023-24 में 3.39, 2024-25 में 3.41 और 2025-26 में 3.42 रहा। वहीं रासायनिक खाद की खपत (लाख टन) 1.30, 1.25, 1.19 से घटकर 1.16 रह गई।