Shimla News: हिमाचल प्रदेश में सड़कों पर घूम रहे बेसहारा और अनुपयोगी मवेशियों की समस्या से निपटने के लिए सरकार अब गौशालाओं के मॉडल में बड़ा बदलाव करने जा रही है। नई योजना के तहत गौशालाओं को बजट देने के बजाय सीधे उन किसानों को वित्तीय मदद दी जाएगी, जो इन मवेशियों को पालेंगे।
ब्लॉक स्तर पर तैयार होगा अनुपयोगी पशुओं का डिजिटल डेटा
सरकार ब्लॉक स्तर पर ऐसे पशुओं का अलग डेटा जुटाएगी, जो दूध देने या प्रजनन में सक्षम नहीं हैं। इस डेटा को बाद में स्ट्रे कैटल पॉलिसी में शामिल किया जाएगा। पंचायत स्तर पर पालतू और बेसहारा पशुओं की पूरी जानकारी जुटाई जाएगी। इस कदम से वास्तविक पशुपालकों को वित्तीय सहायता देने की रूपरेखा बनेगी।
मवेशियों का पूरा विवरण तैयार होने के बाद इसे एक विशेष पोर्टल पर दर्ज किया जाएगा। इससे सरकार को पंचायतवार और जिलावार सटीक आंकड़ा मिल सकेगा। पोर्टल के जरिए पता चलेगा कि किस किसान के पास कितने पालतू और कितने अनुपयोगी पशु हैं। पंचायत स्तर पर फार्मासिस्ट भी पशुओं की स्थिति की निगरानी करेंगे।
वर्तमान में प्रदेश सरकार सरकारी और निजी गौशालाओं पर करीब 70 करोड़ रुपये खर्च कर रही है। गौशालाओं को प्रति पशु 1200 रुपये की मदद दी जाती है। कई गौशालाओं में मवेशियों को समय पर चारा-पानी न मिलने की शिकायतें मिली हैं। इसी कारण सरकार अब जिम्मेदारी सीधे किसानों को सौंपने पर विचार कर रही है।
बेसहारा पशुओं के लिए तैयार होगा फुलप्रूफ सिस्टम
कृषि एवं पशुपालन मंत्री प्रो. चंद्र कुमार ने कहा कि सरकार एक फुलप्रूफ व्यवस्था तैयार कर रही है, जिससे सड़कों पर लावारिस मवेशियों की संख्या घटाई जा सके। उन्होंने स्पष्ट किया कि बेसहारा पशुओं के प्रबंधन के लिए केंद्र सरकार से कोई वित्तीय मदद नहीं मिलती है। राज्य सरकार अपने संसाधनों से पूरा बजट उपलब्ध करवा रही है।