Bilaspur News: आज पुराने बिलासपुर शहर को गोविंद सागर झील में समाए पूरे 65 वर्ष हो गए हैं। 9 अगस्त 1961 को भाखड़ा बांध निर्माण के कारण बिलासपुर का ऐतिहासिक शहर और 354 गांव पानी में डूब गए थे। इस वजह से 12 हजार परिवारों के 52 हजार लोग बेघर हुए थे।
विस्थापितों का पुनर्वास और संघर्ष आज भी अधूरा है। कहलूर रियासत के राजा दलीपचंद द्वारा बसाए गए इस ऐतिहासिक शहर में एक समृद्ध संस्कृति बसती थी। धौलरा का महल, चामडू के कुएं, पंचरुखी का मीठा पानी और गोपाल मंदिर के दुर्लभ चित्र भाखड़ा बांध की झील की गहराइयों में हमेशा के लिए खो गए।
देश के प्रथम प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू ने विस्थापितों से बेहतर सुविधाओं और पुनर्वास का वादा किया था। हालांकि विस्थापितों का आरोप है कि यह वादा सिर्फ आश्वासन बनकर ही रह गया। उन्हें अपनी शरण ली हुई जमीनों का मालिकाना हक तक नहीं मिल सका, जिससे उनका संघर्ष आज भी जारी है।
अवैध कब्जों को नियमित करने के लिए लागू की गई 150 वर्ग मीटर की पॉलिसी भी विस्थापितों के बजाय गैर-विस्थापितों के लिए अधिक फायदेमंद साबित हुई। सर्वदलीय भाखड़ा विस्थापित समिति के पंडित जयकुमार शर्मा और देशराज शर्मा ने आरोप लगाया कि विस्थापितों को लगातार राजनीतिक उपेक्षा का शिकार होना पड़ा है।
दिवंगत विधायक पंडित दीनानाथ ने अपनी प्रसिद्ध कविता ‘नौ अगस्त की शाम’ में इस विस्थापन के दर्द को बयां किया था। वर्तमान में विस्थापितों के लिए सबसे बड़ा मुद्दा उचित प्लॉट आवंटन और पुनर्वास है। राज्य सरकार ने अब निजी जमीन खरीदकर विस्थापितों को प्लॉट देने की नई योजना तैयार की है।
इससे पहले एम्स के पास चंगर पलासीं की 256 बीघा जमीन और ग्वालथाई में सरकारी भूमि का चयन किया गया था, लेकिन वे उपयुक्त नहीं पाई गईं। अब प्रशासन ने निजी भूमि खरीदने का प्रस्ताव सरकार को भेजा है, जिसकी स्वीकृति के बाद दशकों से प्लॉट का इंतजार कर रहे लोगों को राहत मिल सकती है।
पूर्व वीरभद्र सिंह सरकार ने एचआरटीसी कॉलोनी के पास विस्थापितों के लिए दो सेक्टर तैयार किए थे। हालांकि विस्थापितों की रुचि न होने के कारण वह योजना ठंडे बस्ते में चली गई थी। अब नए प्रस्ताव से उम्मीद जगी है कि छह दशकों से भटक रहे परिवारों को आखिरकार उनका हक मिल सकेगा।