Shimla News: जनसरोकार से जुड़े सरकारी विभागों और आम नागरिकों के बीच भाषा का सेतु कमजोर होता जा रहा है। पटना में पशुपालकों के सम्मेलन में अंग्रेजी भाषणों से उपजी असहजता हो या हाल ही में हिमाचल प्रदेश के जलशक्ति विभाग द्वारा अंग्रेजी में प्रकाशित सफलता की कहानियां, प्रशासनिक संप्रेषण का यह अंतर लगातार गहरा रहा है।
हिमाचल प्रदेश जलशक्ति विभाग ने उत्कृष्ट कार्यों को सहेजने के लिए सौ सफलता की कहानियों पर आधारित पुस्तक का प्रकाशन अंग्रेजी भाषा में किया। जल संरक्षण और सुगम जलापूर्ति जैसे अभियानों में जमीनी स्तर पर जुटे पंप ऑपरेटरों, लाइनमैनों और ग्रामीण लाभार्थियों की मेहनत को जिस भाषा में प्रस्तुत किया गया, वह उनकी समझ से कोसों दूर है।
जनता और कर्मचारियों से कटती प्रशासनिक रिपोर्टें
किसी विभाग की उपलब्धियों को संजोना निसंदेह सराहनीय कदम है, लेकिन संवाद की भाषा का चयन प्राथमिकता होना चाहिए। जब जमीनी कार्यकर्ता और आम नागरिक सामग्री को अपनी भाषा में पढ़ ही नहीं पाएंगे, तो कार्य का वास्तविक अनुकरण कैसे संभव होगा। संवादहीनता की यह प्रवृत्ति विभागों को उनके मूल सरोकारों से दूर कर देती है।
एचआरटीसी की कॉफी टेबल बुक और अनुवाद की खामियां
हिमाचल पथ परिवहन निगम के पचास वर्ष पूरे होने पर भी ऐसी ही कॉफी टेबल बुक अंग्रेजी में छापी गई। कठिन पहाड़ी रास्तों और हिमपात के बीच सेवाएं देने वाले हजारों चालकों और परिचालकों की गाथाएं उनकी अपनी भाषा में नहीं आ सकीं। विभागीय वेबसाइटों पर हिंदी अनुवाद के नाम पर अशुद्ध और हास्यास्पद शब्दावली परोसी जा रही है।
अदालतों और थानों में उलझी जटिल शब्दावली
कार्यालयों में अंग्रेजी की प्रधानता के साथ-साथ थानों और न्यायालयों में प्रयुक्त होने वाली पुरानी अरबी-फारसी शब्दावली आज भी आमजन के लिए पहेली बनी हुई है। अधिकार पत्र जैसे सरल शब्दों के स्थान पर क्लिष्ट शब्दों के प्रयोग से भ्रम बढ़ता है। जनसरोकार की नीतियों को सफल बनाने के लिए प्रशासन को अपनी भाषा में सुधार करना होगा।