देश में हर साल दिल की बीमारी से पीड़ित 2.1 लाख बच्चे इलाज से वंचित, गर्भ में ही पहचान संभव: विशेषज्ञ

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National Health: भारत में जन्मजात और आनुवंशिक हृदय रोग से पीड़ित करीब 2.1 लाख बच्चे हर साल समय पर इलाज न मिलने के कारण गंभीर जोखिम का सामना करते हैं। विशेषज्ञों के अनुसार, ‘फीटल इकोकार्डियोग्राफी’ तकनीक से गर्भ में ही दिल की गड़बड़ियों का पता लगाकर जन्म से पहले उपचार की रूपरेखा तैयार की जा सकती है।

देश में जन्मजात और आनुवंशिक हृदय रोगों से जूझ रहे नवजातों और बच्चों के समय पर उपचार को लेकर गंभीर स्थिति बनी हुई है। आधुनिक चिकित्सा तकनीक की मदद से अब गर्भ के भीतर ही भ्रूण के दिल की संरचना और कार्यप्रणाली में विकारों की पहचान संभव हो चुकी है, इसके बावजूद जागरूकता की भारी कमी और जांच सुविधाओं के सीमित प्रसार के चलते हर साल लगभग 2.1 लाख बच्चे जरूरी इलाज से वंचित रह जाते हैं।

एम्स (AIIMS) की पूर्व प्रोफेसर डॉ. अनीता सक्सेना के अनुसार, भारत में प्रतिवर्ष दो लाख से अधिक बच्चे जन्मजात हृदय रोग के साथ जन्म लेते हैं। इनमें से प्रत्येक पांचवें बच्चे को जन्म के पहले वर्ष के भीतर ही तत्काल चिकित्सीय या सर्जिकल उपचार की आवश्यकता होती है।

फीटल इकोकार्डियोग्राफी से गर्भ में ही पहचान

मैक्स अस्पताल (पटपड़गंज) की बाल हृदय रोग विशेषज्ञ डॉ. मिली रे का कहना है कि ‘फीटल इकोकार्डियोग्राफी’ एक ऐसी उन्नत जांच प्रक्रिया है जिससे गर्भ में पल रहे शिशु के दिल और उसकी बनावट में मौजूद विसंगतियों का समय रहते पता लगाया जा सकता है। समय पर निदान होने से चिकित्सकों और अभिभावकों को प्रसव के दौरान विशेष प्रबंध करने और शिशु के जन्म लेते ही उपचार या सर्जरी की तैयारी करने में मदद मिलती है।

बच्चों में अचानक मौत का कारण बन रहीं आनुवंशिक बीमारियां

बाल हृदय रोग विशेषज्ञों के अनुसार, बच्चों में अप्रत्याशित मौत (सडन कार्डियक डेथ) का एक बड़ा कारण आनुवंशिक हृदय रोग भी हैं। ऐसे रोगों में बाहर से पूरी तरह स्वस्थ और सामान्य दिखने वाले बच्चों की दिल की धड़कन तीव्र व्यायाम, खेलकूद या मानसिक तनाव के दौरान अचानक जानलेवा रूप से अनियंत्रित हो जाती है।

डॉ. मिली रे के अनुसार, कई आनुवंशिक विकारों में दिल की विद्युत और धड़कन नियंत्रण प्रणाली प्रभावित हो जाती है:

  • ब्रुगाडा सिंड्रोम: इसमें हृदय की धड़कन को नियंत्रित करने वाले सिग्नल सिस्टम में असंतुलन आ जाता है।
  • डब्ल्यूपीडब्ल्यूपीडब्ल्यू सिंड्रोम (WPW Syndrome): इसमें हृदय के कक्षों तक धड़कन के संकेत पहुंचाने का एक अतिरिक्त असामान्य रास्ता बन जाता है, जिससे धड़कन खतरनाक स्तर तक तेज हो सकती है।
  • कार्डियोमायोपैथी: कुछ बच्चों में दिल की मांसपेशियां अत्यधिक मोटी या कमजोर हो जाती हैं, जिससे रक्त पंप करने की क्षमता क्षीण होने लगती है।

इन लक्षणों और पारिवारिक इतिहास को न करें नजरअंदाज

विशेषज्ञों का कहना है कि शारीरिक श्रम या खेलकूद के दौरान और उसके तुरंत बाद बेहोशी, दौरे (फिट्स), सीने में असहजता या दर्द, अत्यधिक सांस फूलना और दिल की अप्रत्याशित तेज धड़कन जैसे संकेतों को सामान्य समझकर नजरअंदाज करना घातक हो सकता है।

इसके अलावा, यदि परिवार में कम उम्र में किसी की अचानक मौत हुई हो, तैरते समय डूबने की संदिग्ध घटना हुई हो, या आनुवंशिक हृदय रोग व बहरापन का पारिवारिक इतिहास रहा हो, तो बच्चों की चिकित्सीय जांच अवश्य करानी चाहिए। अचानक मृत्यु के मामलों में तात्कालिक कारण भले ही कार्डियक अरेस्ट हो, लेकिन उसके मूल कारणों की पहचान के लिए सिर-छाती की चोट, न्यूरोलॉजिकल और फेफड़ों से जुड़ी समस्याओं की भी गहन जांच जरूरी है।

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