Delhi News: केंद्र सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में स्वीकार किया है कि अस्पताल मरीजों से दवाओं और मेडिकल सामानों पर अत्यधिक कीमत वसूल रहे हैं। रसायन और उर्वरक मंत्रालय ने हलफनामा दायर कर बताया कि कैंसर की दवाओं पर 170% से 700% और मेडिकल सामग्री पर 1000% तक मार्जिन वसूला जा रहा है।
मरीजों और अस्पतालों के बीच मोलभाव की क्षमता में बड़ा अंतर
सरकार ने कोर्ट में इस चलन को गलत तरीका बताया और कहा कि मरीजों के पास दवाओं और उनके विकल्पों की जानकारी काफी कम होती है। इस वजह से वे अस्पतालों के मुकाबले कमजोर स्थिति में होते हैं। सरकार का मानना है कि भारतीय बाजार में प्रतिस्पर्धा होने के बावजूद केवल प्रतिस्पर्धा के भरोसे कीमतों को नियंत्रित नहीं किया जा सकता।
केंद्र ने कैंसर की नॉन-शेड्यूल्ड दवाओं पर ट्रेड मार्जिन को 30% तक सीमित करने का प्रस्ताव रखा है। इस कदम से इन दवाओं की कीमतों में 20% से 70% तक की कमी आ सकती है। इससे मरीजों के सालाना करीब 2,500 करोड़ रुपये बचेंगे। सरकार प्रस्तावित मूल्य सीमा वाली दवाओं की सूची भी जारी करेगी।
मेडिकल सामग्री पर 1000 प्रतिशत तक का भारी भरकम मार्जिन
हलफनामे में इलाज में इस्तेमाल होने वाली मेडिकल सामग्री (कंज्यूमेबल्स) पर 100% से लेकर 1,000% या उससे ज्यादा मार्जिन वसूले जाने पर गहरी चिंता जताई गई है। अस्पताल ऐसी सामग्री चुनते हैं जिनकी खरीद लागत बेहद कम और एमआरपी बहुत ज्यादा होती है। बीमा से बाहर इलाज कराने वाले मरीजों पर इसका सीधा और भारी बोझ पड़ता है।
सुप्रीम कोर्ट ने सुनवाई के दौरान 2,700 रुपये की दवा 27,000 रुपये एमआरपी पर बेचे जाने के मामले का जिक्र करते हुए इसे धोखाधड़ी करार दिया। कोर्ट ने सवाल उठाया कि मूल्य नियंत्रण के नियम केवल कैंसर तक ही सीमित क्यों रहें। सरकार ने स्पष्ट किया कि वह हितधारकों से बात करके व्यापक नियामक उपाय तैयार कर रही है।