Delhi News: ग्रामीण भारत में आमदनी की रफ्तार कमजोर पड़ रही है, जिससे बचत और भविष्य के भरोसे पर असर पड़ रहा है। नाबार्ड के जुलाई 2026 के सर्वे के अनुसार, अधिकांश परिवारों की आय में बढ़ोतरी नहीं हुई है। इसके बावजूद घरेलू खर्च लगातार बढ़ता जा रहा है, जिससे आम ग्रामीण परिवारों की वित्तीय स्थिति पर दबाव साफ देखा जा रहा है।
ग्रामीण परिवारों की आय और रोजगार पर संकट
राष्ट्रीय कृषि एवं ग्रामीण विकास बैंक के जुलाई 2026 के सर्वे में देशभर के बीस हजार ग्रामीण परिवारों ने हिस्सा लिया। इनमें से बावन प्रतिशत से अधिक परिवारों ने कहा कि पिछले एक साल में उनकी आय नहीं बढ़ी है। लगभग बीस प्रतिशत परिवारों की आमदनी घट गई है। केवल सत्ताईस प्रतिशत परिवारों की आय में बढ़ोतरी हुई है, जो सितंबर चौबीस के बाद सबसे निचला स्तर है। अगले तीन महीनों में रोजगार बेहतर होने की उम्मीद केवल उनतालीस प्रतिशत परिवार ही जता रहे हैं।
घरेलू खर्च और उपभोग व्यय में भारी वृद्धि
आय में कमजोरी के बावजूद ग्रामीण परिवारों का घरेलू खर्च लगातार बढ़ रहा है। सर्वे में तिहत्तर प्रतिशत से अधिक परिवारों ने माना कि पिछले एक साल में उनका उपभोग खर्च बढ़ा है। ग्रामीण परिवार अपनी मासिक आय का बड़ा हिस्सा उपभोग पर खर्च कर रहे हैं। इसके मुकाबले बहुत कम हिस्सा बचत में जाता है और एक बड़ा हिस्सा पुराने कर्ज चुकाने में खर्च हो रहा है।
नाबार्ड सर्वे के महत्वपूर्ण और प्रमुख आंकड़े
सर्वे के आंकड़े बताते हैं कि ग्रामीण इलाकों में वित्तीय चुनौतियां किस तरह बढ़ रही हैं। लगभग सत्तर प्रतिशत परिवारों को अगले एक साल में आय बढ़ने की उम्मीद है। वहीं, चौहत्तर प्रतिशत से अधिक परिवारों का उपभोग खर्च बढ़ा है। ग्रामीण परिवार अपनी मासिक आय का छियासठ प्रतिशत से अधिक हिस्सा उपभोग पर खर्च कर रहे हैं। इसके अलावा, तेरह प्रतिशत से अधिक बचत और बारह प्रतिशत हिस्सा कर्ज चुकाने में जा रहा है। लगभग तेईस प्रतिशत परिवार पूरी तरह अनौपचारिक स्रोतों से कर्ज ले रहे हैं।
महंगाई की बढ़ती चिंता और भविष्य का अनुमान
ग्रामीण परिवारों के बीच कीमतों को लेकर चिंता लगातार बढ़ती जा रही है। जुलाई 2026 के सर्वे में उत्तरदाताओं ने अगले एक साल के दौरान औसत महंगाई दर लगभग छह प्रतिशत रहने का अनुमान जताया है। मार्च 2026 में यही अनुमान चार प्रतिशत से थोड़ा अधिक था। कुछ ही महीनों में महंगाई की आशंका बढ़ने से ग्रामीण परिवारों की मुश्किलें और अधिक बढ़ गई हैं, क्योंकि वे पहले ही अपनी आमदनी का अधिकांश हिस्सा रोजमर्रा के खर्चों पर लगा रहे हैं।