New Delhi News: सोशल मीडिया पर वायरल एक वीडियो में गोलगप्पे बेचने वाले एक व्यक्ति की कमाई और कार्यशैली ने आईआईटी ग्रेजुएट्स को हैरान कर दिया। वीडियो के अनुसार, चार आउटलेट चलाने वाला यह वेंडर सभी खर्चे काटकर हर महीने लगभग 4.5 लाख रुपये का शुद्ध मुनाफा कमा रहा है। इस खुलासे के बाद इंटरनेट पर नौकरी बनाम व्यवसाय को लेकर व्यापक चर्चा शुरू हो गई है।
भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान (आईआईटी) से पढ़ाई पूरी कर चुके युवाओं का एक वीडियो इन दिनों सोशल मीडिया पर चर्चा का विषय बना हुआ है। आईआईटी गुवाहाटी की पूर्व छात्रा वैष्णवी श्रीवास्तव ने अपने इंस्टाग्राम अकाउंट पर एक वीडियो साझा किया, जिसमें उनके साथ आईआईटी दिल्ली, आईआईटी कानपुर और आईआईटी हैदराबाद से पढ़े उनके तीन साथी भी नजर आ रहे हैं। इस वीडियो में उन्होंने एक स्थानीय पानी-पुरी विक्रेता से हुई बातचीत और उसके कारोबार से जुड़े आर्थिक आंकड़ों को साझा किया है।
6 घंटे काम और प्रति ठेला 1.2 लाख का शुद्ध मुनाफा
वीडियो में दी गई जानकारी के अनुसार, संबंधित गोलगप्पे विक्रेता एक ठेले से हर महीने सभी परिचालन खर्चे निकालने के बाद लगभग 1 लाख 20 हजार रुपये का शुद्ध मुनाफा कमाता है। काम के घंटों की बात करें तो वह शाम 4 बजे से रात 10 बजे तक, यानी रोजाना औसतन 6 घंटे दुकान लगाता है। अपनी मर्जी का मालिक होने के कारण वह आवश्यकतानुसार साप्ताहिक अवकाश तय करता है। विक्रेता के इस कार्य-संतुलन और आमदनी को देखकर वीडियो में मौजूद युवा अपनी कॉर्पोरेट नौकरियों की तुलना करते हुए हल्के-फुल्के अंदाज में आश्चर्य जताते दिखे।
4 आउटलेट्स, अपना मकान और स्कॉर्पियो कार
बातचीत के दौरान यह भी सामने आया कि उक्त वेंडर शहर में केवल एक ठेला नहीं चलाता, बल्कि उसके तीन अन्य आउटलेट भी संचालित होते हैं। चारों आउटलेट्स को मिलाकर उसकी कुल मासिक शुद्ध कमाई लगभग 4.5 लाख रुपये से अधिक बैठती है। वैष्णवी ने वीडियो के माध्यम से यह भी बताया कि इस वेंडर का अपना निजी मकान है और वह महिंद्रा स्कॉर्पियो गाड़ी का इस्तेमाल करता है। उन्होंने इस क्लिप को ‘कॉर्पोरेट कर्मचारी बनाम उद्यमी’ के संदर्भ में प्रस्तुत किया।
सोशल मीडिया पर उपयोगकर्ताओं ने दिखाई जमीनी हकीकत
वीडियो के वायरल होते ही सोशल मीडिया उपयोगकर्ताओं ने कॉर्पोरेट नौकरी और स्ट्रीट वेंडिंग के बीच तुलना शुरू कर दी। जहां कुछ लोगों ने स्वतंत्र व्यवसाय और जमीनी स्तर के मुनाफे की सराहना की, वहीं कई उपयोगकर्ताओं ने इसके पीछे की कड़ी मेहनत की ओर भी ध्यान दिलाया।
कई यूजर्स ने टिप्पणी की कि भले ही ठेले पर बिक्री का समय 6 घंटे दिखता हो, लेकिन उसके लिए दिन में सामग्री तैयार करने, पानी, मटर और पूरी बनाने में कई घंटों का अतिरिक्त श्रम लगता है। इसके अलावा, वातानुकूलित दफ्तरों में बैठकर काम करने की तुलना में धूप, बारिश, ठंड और प्रदूषण के बीच सड़क पर घंटों खड़े रहकर काम करना शारीरिक रूप से बेहद थकाऊ होता है। कई लोगों ने यह भी रेखांकित किया कि शैक्षणिक योग्यता और तकनीकी विशेषज्ञता का सामाजिक महत्व वित्तीय आंकड़ों से अलग होता है।