राजस्थान के सीमावर्ती इलाकों में 50 जीबी और 25 एपीडी जैसे कोड वाले नाम, जानिए नहरी व्यवस्था का पूरा गणित

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Sri Ganganagar News: अनूपगढ़-सूरतगढ़ रेल लाइन पर विस्फोट के बाद चर्चा में आए 50 जीबी गांव के नामकरण के पीछे राजस्थान की ऐतिहासिक नहरी सिंचाई व्यवस्था जुड़ी है। सीमावर्ती जिलों में गांवों के नाम अक्षरों और संख्याओं के कोड पर रखे गए हैं। ’50 जीबी’ में ‘जीबी’ गजसिंहपुर बेड नहर शाखा को और ’50’ उस शाखा के 50वें चक को दर्शाता है।

राजस्थान के अनूपगढ़-सूरतगढ़ रेल सेक्शन पर 50 जीबी गांव के पास रेलवे ट्रैक पर हुए हालिया विस्फोट के बाद यह क्षेत्र सुरक्षा एजेंसियों की जांच के केंद्र में है। भारत-पाकिस्तान अंतरराष्ट्रीय सीमा से महज 15 से 20 किलोमीटर की दूरी पर स्थित होने के कारण सुरक्षा बल सतर्क हैं और कई ट्रेनों के रूट बदले गए हैं। इस घटनाक्रम के बीच आम लोगों में यह जिज्ञासा भी पैदा हुई है कि सीमावर्ती क्षेत्रों के गांवों के नाम ’50 जीबी’, ’40 पीबी’ या ’25 एपीडी’ जैसे गणितीय और तकनीकी कोड पर आधारित क्यों रखे गए हैं।

श्रीगंगानगर, अनूपगढ़ और बीकानेर के सीमावर्ती इलाकों का इतिहास नहरी सिंचाई के विकास से जुड़ा हुआ है। 1920 के दशक में बीकानेर के तत्कालीन महाराजा गंगा सिंह ने ऐतिहासिक गंग नहर का निर्माण करवाया था। इसके बाद इंदिरा गांधी नहर परियोजना का विस्तार हुआ। नहरों के निर्माण से पहले यह क्षेत्र आबादी विहीन रेतीला भूभाग था। कृषि भूमि के बंदोबस्त और सिंचाई के पानी के समान वितरण के लिए प्रशासनिक स्तर पर पूरी जमीन को चौकोर हिस्सों में बांटा गया, जिन्हें ‘चक’ कहा गया।

नहरी कोड और संख्याओं का प्रशासनिक गणित

इन गांवों के नाम में आने वाले अंग्रेजी अक्षर और संख्याएं एक तय राजस्व और सिंचाई प्रणाली के तहत निर्धारित किए गए हैं। 50 जीबी नाम में अंग्रेजी का ‘जीबी’ (GB) अक्षर ‘गजसिंहपुर बेड’ नहर शाखा की ओर संकेत करता है। वहीं इसके साथ जुड़ी संख्या ’50’ यह बताती है कि यह चक उस नहर के हेड (शुरुआती बिंदु) से 50वें क्रम पर स्थित है।

इसी प्रशासनिक व्यवस्था के तहत आसपास के अन्य गांवों का नामकरण भी हुआ है। उदाहरण के लिए, एपीडी (APD) अनूपगढ़ डिस्ट्रीब्यूटरी, जेएम (JM) जैतसर माइनर और एच (H) हरिसिंहपुरा माइनर की पहचान कराते हैं। समय के साथ इन चकों पर आबादी बसती गई और राजस्व दस्तावेजों में दर्ज यही कोड इन गांवों के स्थायी नाम बन गए।

विशेषज्ञों ने समझाई चकबंदी और बसावट की प्रक्रिया

राजकीय डूंगर महाविद्यालय, बीकानेर के इतिहास विभाग के असिस्टेंट प्रोफेसर श्रीराम नायक के अनुसार, जब इस क्षेत्र में इंदिरा गांधी नहर परियोजना (आईजीएनपी) के तहत नहरों का जाल बिछाया गया, तब मुख्य नहरों से कई छोटी वितरिकाएं और माइनर निकाली गईं। इन नहर शाखाओं के आधार पर ही बस्तियों का विस्तार हुआ। यही कारण है कि अधिकांश गांवों के नाम में उनसे जुड़ी नहर और चक की संख्या दिखाई देती है।

वहीं, बीकानेर कलेक्ट्रेट के गिरदावर किशन सोनी ने चकबंदी प्रक्रिया के बारे में बताया कि मुख्य नहर से निकलने वाली वितरिकाओं के आधार पर चक बनाए जाते हैं। नहरी सिंचाई की सुविधा वाले क्षेत्रों में चकबंदी व्यवस्था लागू होती है, जहां भूमि का विभाजन ‘किला’ और ‘मुरब्बा’ के रूप में किया जाता है, जिसमें एक किला एक बीघा के बराबर होता है। इसके विपरीत, गैर-नहरी क्षेत्रों में जमीन का रिकॉर्ड पारंपरिक खसरा संख्या के आधार पर रखा जाता है।

सामरिक रूप से संवेदनशील है क्षेत्र

भौगोलिक दृष्टि से 50 जीबी गांव अंतरराष्ट्रीय सीमा के बेहद नजदीक है। सीमा से केवल 15 से 20 किलोमीटर की दूरी पर स्थित होने के कारण यह पूरा इलाका सामरिक रूप से संवेदनशील माना जाता है। इसी गांव के समीप एक पैसेंजर ट्रेन के गुजरने के कुछ समय बाद रेलवे ट्रैक पर धमाका हुआ था। संवेदनशीलता को देखते हुए स्थानीय पुलिस के साथ राज्य और केंद्रीय सुरक्षा एजेंसियां मामले की गहन जांच कर रही हैं।

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