Shimla News: भारी आर्थिक संकट और एक लाख करोड़ रुपये से अधिक के कर्ज से जूझ रही हिमाचल प्रदेश सरकार ने राज्य में 27 साल बाद फिर से सरकारी लॉटरी शुरू करने का फैसला लिया है। इसके लिए ई-टेंडर जारी कर दिए गए हैं। सरकार को इससे सालाना 50 करोड़ रुपये के राजस्व मिलने की उम्मीद है।
कोष, लेखा एवं लॉटरी निदेशालय ने 21 अगस्त 2026 को सोल सेलिंग एजेंट की नियुक्ति के लिए टेंडर प्रक्रिया शुरू की। ऑनलाइन बोली 3 सितंबर से 14 सितंबर तक जमा होगी। इसके बाद 15 सितंबर को तकनीकी बोली खोली जाएगी। प्रक्रिया पूरी होने के बाद चयनित एजेंसी को काम सौंप दिया जाएगा।
सरकार की योजना के मुताबिक, अगर टेंडर प्रक्रिया समय पर पूरी हुई तो दिवाली के आसपास पहला बड़ा ड्रॉ निकाला जा सकता है। लॉटरी टिकटों की बिक्री काउंटर के अलावा डिजिटल माध्यम से भी होगी। लोग ऑनलाइन और ऑफलाइन दोनों तरीकों से टिकट खरीद सकेंगे। न्यूनतम टिकट दर 2 रुपये रखी जा सकती है।
राज्य सरकार ने लॉटरी संचालन से सालाना 50 करोड़ रुपये राजस्व कमाने का लक्ष्य रखा है। पंजाब और केरल की तर्ज पर यह कदम उठाया गया है। चयनित एजेंट को हर साल 10 करोड़ रुपये लाइसेंस फीस देनी होगी। इसमें हर साल 5 प्रतिशत की बढ़ोतरी होगी। साथ ही 30 करोड़ की सिक्योरिटी जमा करनी होगी।
नई व्यवस्था में एक दिन में अधिकतम 12 लॉटरी ड्रॉ होंगे। इसके अलावा दिवाली, न्यू ईयर और अन्य बड़े त्योहारों पर साल में तीन बंपर ड्रॉ रखे जाएंगे। 15 अगस्त, 26 जनवरी और 2 अक्टूबर को कोई ड्रॉ नहीं होगा। पूरी प्रक्रिया पारदर्शी रखने के लिए डिजिटल रिकॉर्ड और ऑडिट ट्रेल की व्यवस्था की गई है।
हिमाचल प्रदेश में वर्ष 1999 में तत्कालीन प्रेम कुमार धूमल सरकार ने सामाजिक नुकसान और धोखाधड़ी की शिकायतों के बाद लॉटरी बंद कर दी थी। अब करीब 27 साल बाद सुक्खू सरकार ने नए राजस्व स्रोत जुटाने के लिए इसे दोबारा शुरू करने का बड़ा फैसला लिया है, जिसे लेकर राज्य में राजनीतिक सरगर्मी बढ़ गई है।
बीजेपी ने सरकार के इस कदम की तीखी आलोचना की है। हमीरपुर से बीजेपी सांसद अनुराग ठाकुर ने मुख्यमंत्री सुखविंदर सिंह सुक्खू को पत्र लिखकर टेंडर तुरंत वापस लेने की मांग की है। उन्होंने कहा कि लॉटरी से होने वाली कमाई वित्तीय संकट का स्थायी समाधान नहीं है और इसे तुरंत रद्द किया जाना चाहिए।