Delhi News: दिल्ली उच्च न्यायालय ने दुष्कर्म और रात में घर में घुसपैठ के एक मामले में निचली अदालत के फैसले को निरस्त कर दिया है। अदालत ने मामले के सभी आरोपियों को दोषमुक्त करते हुए कहा कि घटना के समय पीड़िता कानूनी रूप से सहमति देने की उम्र पूरी कर चुकी थी। रिकॉर्ड के अनुसार दोनों के बीच संबंध सहमति से बने थे।
न्यायमूर्ति विमल कुमार यादव की पीठ ने दिलदार नामक व्यक्ति की याचिका स्वीकार करते हुए नंद नगरी पुलिस स्टेशन में दर्ज मामले में भारतीय दंड संहिता की धारा 376 और 457 के तहत दी गई सजा को रद्द कर दिया। अदालत ने टिप्पणी की कि अभियोजन पक्ष यह साबित करने में पूरी तरह विफल रहा कि संबंध पीड़िता की इच्छा के विरुद्ध बनाए गए थे।
‘अजनबी नहीं था आरोपी, घटना के बाद पीड़िता खुद उसके साथ गई थी’
अदालत ने सुनवाई के दौरान कहा कि घटना वाली रात भले ही पीड़िता की मां ने किसी अनजान व्यक्ति को देखकर शोर मचाया था, लेकिन परिस्थितियों से स्पष्ट है कि युवती उसे पहले से जानती थी। अदालत ने इस बात को विशेष रूप से रेखांकित किया कि आरोपी के मौके से भागने के बाद पीड़िता भी स्वेच्छा से उसके पीछे चली गई थी।
अदालती दस्तावेजों के अनुसार, दोनों घटना के बाद रैन बसेरे और अन्य ठिकानों पर काफी समय तक एक साथ रहे, जिसके बाद पुलिस ने उन्हें बरामद किया। मेडिकल और शैक्षणिक साक्ष्यों के आधार पर बचाव पक्ष ने साबित किया कि 2 सितंबर 2012 को घटना के समय लड़की की आयु 16 वर्ष से अधिक थी, जिससे जबरन संबंध बनाने का दावा खारिज हो गया।
सहमति की कानूनी उम्र: 2013 के संशोधन से पहले के नियम का उल्लेख
अदालत ने स्पष्ट किया कि 3 फरवरी 2013 से पहले लागू कानून के तहत आईपीसी की धारा 375 में सहमति की कानूनी उम्र 16 वर्ष तय थी। यदि 16 वर्ष से अधिक आयु की लड़की अपनी सहमति से संबंध बनाती थी, तो उसे दुष्कर्म की श्रेणी में नहीं रखा जाता था। निर्भया कांड के बाद 2013 में कानून संशोधित कर यह उम्र बढ़ाकर 18 वर्ष की गई थी।
न्यायालय ने कहा कि चूंकि यह मामला सितंबर 2012 का है, इसलिए तत्कालीन कानूनी प्रावधानों के अनुसार पीड़िता की आयु सहमति देने के लिए योग्य थी। सभी साक्ष्यों और गवाहों के बयानों का गहन विश्लेषण करने के बाद दिल्ली उच्च न्यायालय ने आरोपी को दी गई सजा को पूरी तरह से खारिज करते हुए उसे बरी कर दिया।