New Delhi News: आधुनिक दौर में भी महिलाओं की बौद्धिक क्षमता को कम आंकने की दकियानूसी सोच देखने को मिलती है। इस मानसिकता की जड़ें सदियों पुरानी उस व्यवस्था से जुड़ी हैं, जहां महिलाओं की पढ़ाई-लिखाई को सामाजिक बुराई के अलावा गंभीर बीमारी के तौर पर देखा जाता था।
उन्नीसवीं सदी में ब्रिटेन और अमेरिका जैसे विकसित मुल्कों में महिलाओं को दिमागी तौर पर बेहद कमजोर समझा जाता था। उस दौर के समाज का मानना था कि औरतें शारीरिक और मानसिक रूप से पढ़ाई का बोझ नहीं उठा सकतीं। ज्यादा किताबें पढ़ने से उनकी सेहत खराब होने की चेतावनी दी जाती थी।
प्रजनन क्षमता घटने और नर्वस सिस्टम डैमेज का फैलाया गया डर
उस समय के तथाकथित चिकित्सा विज्ञान ने यह अजीब दावा किया कि अधिक पढ़ाई से महिलाओं का नर्वस सिस्टम डैमेज हो सकता है। यह धारणा फैलाई गई कि बौद्धिक काम से दिमाग ज्यादा थक जाता है, जिससे उनकी प्रजनन क्षमता पर बुरा असर पड़ता है और वे संतान पैदा करने लायक नहीं रहतीं।
महिलाओं के उपन्यास पढ़ने पर भी कड़े प्रतिबंध लगाए गए थे। इसके पीछे कुतर्क दिया जाता था कि कहानियां पढ़ने से महिलाओं की भावनाएं बेकाबू होती हैं और उनके भीतर आलस पनपता है। समाज में खुलेआम प्रचारित किया गया कि फिक्शन और नॉवेल्स महिलाओं के दिमाग को पूरी तरह भ्रष्ट कर देते हैं।
अमेरिकी डॉक्टर ने इलाज के नाम पर बंद कराई थी पढ़ाई
इस कथित बीमारी से निपटने के लिए अमेरिकी डॉक्टर एस. वेअर मिचेल ने महिलाओं के लिए एक अजीबोगरीब ‘रेस्ट क्योर’ इलाज निकाला। इस तरीके में महिलाओं को पूरी तरह एकांत में बिस्तर पर पड़े रहने की सलाह दी गई थी, ताकि उनका दिमाग किसी भी तरह की पढ़ाई से पूरी तरह दूर रहे।