World News: आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (एआई) को लेकर दुनिया इस समय दो बिल्कुल अलग दावों के बीच खड़ी नजर आ रही है। एक तरफ समर्थक इसे बीमारियों के इलाज और उत्पादकता के लिए क्रांतिकारी बता रहे हैं। वहीं शीर्ष वैज्ञानिक चेतावनी दे रहे हैं कि अत्यधिक शक्तिशाली एआई इंसानियत के अस्तित्व के लिए गंभीर खतरा बन सकती है।
ओपनएआई और एंथ्रोपिक जैसी दिग्गज कंपनियों में काम कर चुके सत्ताईस वर्षीय शोधकर्ता जैकब कॉक्सन के इस्तीफे ने इस बहस को भड़का दिया है। कॉक्सन का आरोप है कि बड़ी प्रयोगशालाएं ऐसी तकनीक बना रही हैं जो खुद को लगातार बेहतर कर सकती हैं। उन्होंने इस अंधी दौड़ को इंसानी जिंदगी के साथ जुआ बताया है।
पी-डूम और सुपरइंटेलिजेंस के खतरों पर वैज्ञानिकों में गहरा मतभेद
एंथ्रोपिक के शोधकर्ता इवान हुबिंगर और एआई के गॉडफादर जेफ्री हिंटन का अनुमान है कि अगले दशक में एआई से मानव विलुप्ति का खतरा दस प्रतिशत तक हो सकता है। ज्योफ्री इरविंग ने यह आशंका पचास प्रतिशत तक जताई है। इस खतरे के अनुमान को तकनीकी भाषा में ‘पी-डूम’ कहा जा रहा है, जिस पर वैज्ञानिक एकमत नहीं हैं।
प्रिंसटन यूनिवर्सिटी के वैज्ञानिक अरविंद नारायणन और सयाश कपूर ने इन आंकड़ों पर सवाल उठाए हैं। उनका कहना है कि इतिहास में पहले कभी सुपरइंटेलिजेंस नहीं बनी, इसलिए ऐसे आंकड़ों का कोई ठोस वैज्ञानिक आधार नहीं है। दूसरी ओर एंथ्रोपिक की रिपोर्ट के अनुसार यमन में हथियार समूहों द्वारा क्लॉड एआई का सैन्य इस्तेमाल करने की कोशिशें भी सामने आई हैं।
सुरक्षा नियमों की आड़ में बिग टेक का बड़ा खेल
इस पूरी बहस के पीछे आर्थिक और रणनीतिक कारण भी छिपे हैं। अगर सरकारें कड़े सुरक्षा नियम लागू करती हैं, तो बड़ी कंपनियां भारी भरकम खर्च आसानी से उठा लेंगी। लेकिन छोटे स्टार्टअप्स के लिए बाजार में टिकना मुश्किल हो जाएगा। ऐसे नियम बड़ी टेक कंपनियों के लिए एक मजबूत सुरक्षा दीवार साबित हो सकते हैं।
साथ ही देशों के बीच यह होड़ है कि अगर उन्होंने रिसर्च धीमी की, तो चीन जैसी प्रतिद्वंद्वी ताकतें आगे निकल जाएंगी। हालांकि एआई से मानवता के अंत की भविष्यवाणियां अभी केवल अनुमान हैं। लेकिन इस बात से भी इनकार नहीं किया जा सकता कि यह तकनीक तेजी से ऐसे मुकाम की ओर बढ़ रही है जिसे संभालना कठिन होगा।