तालिबान और टीटीपी के चक्रव्यूह में उलझा पाकिस्तान, पश्चिमी सीमा पर अपनी ही रणनीतियों का बना शिकार

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Islamabad News: पाकिस्तान अपनी पश्चिमी सीमा पर बनाई गई रणनीतियों के कारण गंभीर सुरक्षा संकट में घिर गया है। दशकों तक अफगानिस्तान सीमा से जुड़े इलाकों में कट्टरपंथी नेटवर्क को रणनीतिक बढ़त के तौर पर बढ़ावा देने की नीति अब उल्टी पड़ चुकी है। सीमा पार से तहरीक-ए-तालिबान पाकिस्तान (TTP) के बढ़ते हमलों और अफगान तालिबान के असहयोग ने उसकी आंतरिक सुरक्षा को खतरे में डाल दिया है।

दशकों तक पाकिस्तान ने अपनी पश्चिमी सीमा पर ऐसे चरमपंथी और कट्टरपंथी नेटवर्क को खड़ा और पोषित किया, जिन्हें वह भारत और अफगानिस्तान के खिलाफ अपने रणनीतिक हित साधने का माध्यम मानता था। हालांकि, अब वही नेटवर्क पाकिस्तान की संप्रभुता और आंतरिक सुरक्षा के लिए सबसे बड़ी चुनौती बन चुका है। जिस खतरे को उसने अपने रणनीतिक लाभ के लिए हवा दी थी, अब उसी का असर उसके अपने शहरों और सुरक्षा बलों पर दिखने लगा है।

हाल ही में अमेरिकी विदेश मंत्री मार्को रुबियो ने जी20 विदेश मंत्रियों की बैठक के दौरान दक्षिण एशिया की इस बदलती सुरक्षा स्थिति पर अहम टिप्पणी की। रुबियो ने स्पष्ट किया कि पाकिस्तान को अफगानिस्तान की जमीन से होने वाले सीमा पार आतंकी हमलों को लेकर वास्तविक सुरक्षा चिंताएं हैं। इसके साथ ही उन्होंने यह भी स्वीकार किया कि काबुल में काबिज तालिबान प्रशासन पर अमेरिका का राजनयिक या सामरिक प्रभाव बेहद सीमित है। इसका अर्थ यह है कि वाशिंगटन पाकिस्तान की चिंताओं को समझ तो रहा है, लेकिन वह तालिबान पर कोई ठोस दबाव बनाने की स्थिति में नहीं है।

रणनीतिक गहराई की नीति कैसे हुई विफल?

पाकिस्तान की सैन्य और खुफिया रणनीति में लंबे समय से ‘स्ट्रैटेजिक डेप्थ’ यानी रणनीतिक गहराई की अवधारणा का दबदबा रहा है। इस रणनीति का मुख्य उद्देश्य अफगानिस्तान में अपनी मनपसंद सत्ता और प्रभाव बनाए रखना था, ताकि भारत के साथ किसी संभावित टकराव की स्थिति में उसकी पश्चिमी सीमा पूरी तरह सुरक्षित रहे और उसे अतिरिक्त रणनीतिक सहारा मिल सके।

इसी सोच के तहत पाकिस्तानी तंत्र पर अफगानिस्तान में कट्टरपंथी संगठनों को खुला समर्थन देने के आरोप लगते रहे। हालांकि, अगस्त 2021 में काबुल में तालिबान के दोबारा सत्ता में आने के बाद इस्लामाबाद का यह गणित पूरी तरह बिगड़ गया। पाकिस्तान को भरोसा था कि नई अफगान सरकार उसकी सुरक्षा चिंताओं को प्राथमिकता देगी, लेकिन इसके विपरीत दोनों मुल्कों के बीच डूरंड रेखा विवाद और आतंकी ठिकानों को लेकर तनाव लगातार बढ़ता चला गया।

टीटीपी और अफगान तालिबान की साठगांठ

वर्तमान में पाकिस्तान के सामने सबसे बड़ा सिरदर्द तहरीक-ए-तालिबान पाकिस्तान (TTP) बना हुआ है, जिसे पाकिस्तानी तालिबान भी कहा जाता है। यह संगठन पाकिस्तान में अपनी चरमपंथी सोच के अनुसार सत्ता व्यवस्था स्थापित करने के उद्देश्य से सक्रिय है। टीटीपी और अफगान तालिबान के बीच वैचारिक, कबीलाई और ऐतिहासिक संबंध बेहद गहरे हैं।

पाकिस्तान का स्पष्ट आरोप है कि टीटीपी के लड़ाके अफगानिस्तान की सुरक्षित पनाहगाहों का इस्तेमाल कर खैबर पख्तूनख्वा और अन्य सीमावर्ती इलाकों में लगातार घुसपैठ करते हैं। इन आतंकियों ने पाकिस्तानी सेना, पुलिस चौकियों और सरकारी प्रतिष्ठानों को निशाना बनाकर बड़े नुकसान पहुंचाए हैं। नतीजा यह है कि जिस इलाके को पाकिस्तान कभी अपने सुरक्षा कवच के तौर पर देखता था, वही क्षेत्र आज उसकी सुरक्षा व्यवस्था में सबसे बड़ी सेंध साबित हो रहा है।

सीमित अमेरिकी प्रभाव और इस्लामाबाद की राह

अगस्त 2021 में अमेरिकी सेना की वापसी के बाद वॉशिंगटन का अफगानिस्तान में प्रत्यक्ष राजनीतिक और सैन्य दखल लगभग समाप्त हो गया है। तालिबान सरकार अपनी स्वतंत्र विदेश नीति पर चल रही है और अंतरराष्ट्रीय दबावों की परवाह किए बिना फैसले ले रही है।

ऐसे में अमेरिकी बयानों या वैश्विक चिंताओं से पाकिस्तान को जमीनी स्तर पर कोई त्वरित राहत मिलने की उम्मीद नहीं है। अपनी ही पिछली नीतियों के परिणाम भुगत रहे पाकिस्तान को अब अपनी पश्चिमी सीमा पर उपजे इस गंभीर सुरक्षा संकट से निपटने के लिए खुद ही नए सिरे से रास्ते तलाशने होंगे।

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