Beijing News: चीन में छह साल की बच्ची की मौत के बाद जीन थेरेपी के ट्रायल पर बड़ा विवाद खड़ा हो गया है। दुर्लभ बीमारी से पीड़ित बच्ची का इलाज करने के लिए डॉक्टरों ने नई थेरेपी का ट्रायल किया था। इलाज के महज सात दिन बाद बच्ची की जान चली गई।
बच्ची ‘स्नाइडर्स ब्लॉक-कैंपो सिंड्रोम’ नाम की दुर्लभ बीमारी से पीड़ित थी। यह बीमारी बच्चों के दिमाग के विकास, सीखने और बोलने की क्षमता को प्रभावित करती है। डॉक्टरों के अनुसार यह बीमारी जानलेवा नहीं मानी जाती है। सही देखभाल और थेरेपी से मरीज लंबा और सामान्य जीवन जी सकते हैं।
जीन थेरेपी और क्रिसपर तकनीक से इलाज
जीन थेरेपी आधुनिक इलाज की वह तकनीक है, जिसमें शरीर के खराब जीन को सुधारा जाता है। इसमें बदले हुए वायरस के जरिए दवा को कोशिकाओं तक पहुंचाया जाता है। इस मामले में डॉक्टरों ने क्रिसपर आधारित बेस एडिटिंग तकनीक का इस्तेमाल किया था। इसके जरिए डीएनए के छोटे हिस्से को बदलने की कोशिश की गई थी।
इलाज शुरू होने के बाद बच्ची को तेज बुखार आया और पेशाब आना बंद हो गया। खून में प्लेटलेट्स तेजी से गिरे और उसे आईसीयू में भर्ती कराया गया। इलाज के सातवें दिन बच्ची ने दम तोड़ दिया। जांच में सामने आया कि उसकी मौत थ्रोम्बोटिक माइक्रोएंजियोपैथी के कारण हुई, जिससे शरीर में खून के थक्के बन जाते हैं।
रिपोर्ट के अनुसार परिजनों ने इस इलाज पर लगभग 8.6 लाख डॉलर खर्च किए थे। माता-पिता का आरोप है कि उन्हें संभावित जानलेवा खतरों के बारे में जानकारी नहीं दी गई थी। इस घटना के बाद चीन में मेडिकल रिसर्च के नियमों, क्लिनिकल ट्रायल की सुरक्षा और सरकारी निगरानी पर गंभीर सवाल खड़े हो गए हैं।