Washington News: अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने भारत समेत लगभग 60 देशों पर 10 से 12.5 फ़ीसदी नया टैरिफ लगाने की घोषणा की है। इसके साथ ही उन्होंने जेनेरिक दवाओं पर 200 फ़ीसदी तक सीमा शुल्क बढ़ाने की मंशा जताई है। इस निर्णय से भारतीय दवा उद्योग और वैश्विक बाज़ार में हड़कंप मच गया है।
जबरन मजदूरी का आरोप और भारतीय विशेषज्ञों की कड़ी प्रतिक्रिया
ट्रंप प्रशासन का दावा है कि ये देश जबरन मजदूरी से तैयार सामान अमेरिका भेज रहे हैं। हालांकि भारत के थिंक टैंक ग्लोबल ट्रेड रिसर्च इनिशिएटिव के संस्थापक अजय श्रीवास्तव ने कहा कि अमेरिकी तर्क में दम नहीं है। अमेरिका ने इसका कोई सबूत नहीं दिया है, जबकि भारत में जबरन मजदूरी पर पूरी तरह रोक है।
अंतरराष्ट्रीय मामलों के विशेषज्ञ कांति वाजपेयी ने लिखा कि भारत के सामने 1991 जैसी कठिन आर्थिक स्थिति खड़ी हो गई है। तब भारत भुगतान संतुलन के भारी संकट से जूझ रहा था। दूसरी ओर चीन, ऑस्ट्रेलिया, ब्रिटेन और ब्राजील ने भी अमेरिकी फैसले का कड़ा विरोध करते हुए इसे एकतरफा और राजनीतिक दुश्मनी से प्रेरित बताया है।
भारतीय फार्मा कंपनियों पर मंडराया संकट और दवाओं का बढ़ा शुल्क
ट्रंप ने ट्रुथ सोशल पर लिखा कि अगस्त 2028 से जेनेरिक दवाओं पर 100 फ़ीसदी और अगस्त 2029 से 200 फ़ीसदी टैरिफ लगेगा। कंपनियों को उत्पादन अमेरिका शिफ्ट करने के लिए दो साल का समय दिया गया है। इस घोषणा के बाद भारतीय दवा कंपनियों के शेयरों में भारी गिरावट दर्ज की गई और कारोबारी नुकसान की आशंका बढ़ गई।
भारत दुनिया की फार्मेसी कहलाता है और अमेरिका की 50 फीसदी जेनेरिक दवाएं भारत से जाती हैं। अमेरिका में 90 फीसदी पर्चियों में जेनेरिक दवाएं ही लिखी जाती हैं। साल 2025 में भारत ने कुल ढाई लाख करोड़ रुपये की दवाओं का निर्यात किया, जिसमें से 93,670 करोड़ रुपये का सामान अकेले अमेरिकी बाज़ार में गया था।
कच्चे माल पर अस्पष्टता और अमेरिकी उपभोक्ताओं पर पड़ेगा सीधा असर
अभी यह साफ नहीं है कि शुल्क केवल तैयार दवाओं पर लगेगा या एपीआई यानी कच्चे माल पर भी। अगर एपीआई पर भी शुल्क लगा, तो उत्पादन लागत काफी बढ़ जाएगी। एक्सपर्ट अनिरुद्ध गर्ग के अनुसार, अधिकांश भारतीय कंपनियों के पास रीशोरिंग यानी अमेरिका में प्लांट लगाने के लिए पर्याप्त पूंजी नहीं है, जिससे वे प्रतिस्पर्द्धा से बाहर हो सकती हैं।
इस फैसले से अमेरिकी उपभोक्ता भी बेहद चिंतित हैं। पेशेंट्स फॉर अफोर्डेबल ड्रग्स की सीईओ मेरिथ बेसी ने कहा कि भारी सीमा शुल्क से दवाएं महंगी हो जाएंगी और सप्लाई में कमी आएगी। इससे लाखों मरीजों को परेशानी झेलनी पड़ेगी और अगर कंपनियां बाज़ार से बाहर हुईं तो अमेरिका में जेनेरिक दवाओं की भारी किल्लत हो सकती है।
