Ranchi News: झारखंड हाईकोर्ट ने एक अहम फैसले में साफ किया है कि महज मानसिक बीमारी का आरोप लगाकर विवाह समाप्त नहीं किया जा सकता। अदालत ने कहा कि तलाक मांगने वाले पक्ष को अपने दावों के समर्थन में ठोस और चिकित्सीय साक्ष्य प्रस्तुत करने होंगे।
जस्टिस सुजीत नारायण प्रसाद और जस्टिस प्रदीप कुमार श्रीवास्तव की पीठ ने गिरिडीह निवासी पति की अपील खारिज करते हुए फैमिली कोर्ट के आदेश को बरकरार रखा। पति ने शादी की पहली रात से ही पत्नी को मानसिक रूप से अस्वस्थ बताने का आरोप लगाया था।
पर्याप्त मेडिकल सबूतों के अभाव में खारिज हुई याचिका
सुनवाई के दौरान अदालत ने पाया कि पति अपनी पत्नी की कथित बीमारी से जुड़ा कोई भी मेडिकल दस्तावेज या ठोस प्रमाण पेश करने में पूरी तरह नाकाम रहा। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि केवल मौखिक बयान या पारिवारिक गवाहों के आधार पर तलाक नहीं दिया जा सकता।
अदालत ने यह भी पाया कि पति क्रूरता के आरोपों को भी साबित नहीं कर सका। पीठ ने कहा कि हिंदू विवाह अधिनियम के तहत मानसिक स्थिति को आधार तभी माना जा सकता है, जब बीमारी इतनी गंभीर हो कि साथ रहना बिल्कुल असंभव हो जाए।
कैदियों की जमानत नियमों में सुधार याचिका पर सुनवाई
दूसरी तरफ, लंबे समय से जेलों में बंद विचाराधीन बंदियों को समय पर जमानत दिलाने के नियमों में सुधार संबंधी जनहित याचिका पर भी सुनवाई हुई। चीफ जस्टिस एमएस सोनक और जस्टिस राजेश शंकर की पीठ ने अगली सुनवाई 15 सितंबर तय की है।
सुनवाई के दौरान अदालत को बताया गया कि कई गरीब कैदी आर्थिक तंगी, चार्जशीट में देरी या बेल बॉन्ड न भर पाने के कारण जेलों में बंद रहते हैं। ऐसे असहाय कैदियों की रिहाई प्रक्रिया को सुगम बनाने के लिए व्यावहारिक नियम बनाने की मांग की गई।