Chitrakoot News: रामचरितमानस के रचयिता गोस्वामी तुलसीदास जी की जयंती श्रावण मास के शुक्ल पक्ष की सप्तमी तिथि को मनाई जाती है। भगवान शिव के आशीर्वाद से उन्होंने अवधी भाषा में इस पावन ग्रंथ की रचना की। उनका अधिकांश जीवन चित्रकूट, काशी और अयोध्या में बीता, जहां उन्हें प्रभु श्री राम की साक्षात कृपा प्राप्त हुई थी।
पौराणिक मान्यताओं के अनुसार काशी प्रवास के दौरान तुलसीदास जी को एक प्रेत के माध्यम से हनुमान जी से मिलने का मार्ग पता चला। कठिन साधना के बाद जब हनुमान जी ने दर्शन दिए, तब तुलसीदास जी ने श्री राम के दर्शन की इच्छा जताई। पवनपुत्र ने उन्हें चित्रकूट जाने और वहां प्रभु के दर्शन का भरोसा दिया।
चित्रकूट के घाट पर प्रभु श्री राम के दिव्य दर्शन
चित्रकूट में एक दिन तुलसीदास जी ने घोड़ों पर सवार दो तेजस्वी युवकों को देखा, परंतु वे पहचान नहीं पाए। बाद में हनुमान जी ने बताया कि वे स्वयं राम-लक्ष्मण थे। अपनी भूल पर दुखी तुलसीदास जी को हनुमान जी ने सांत्वना दी कि अगले दिन उन्हें बालक रूप में प्रभु के पुनः दर्शन होंगे।
अगली सुबह घाट पर चंदन घिसते समय जब बालक रूप में श्री राम आए, तब हनुमान जी ने तोते का रूप धरकर प्रसिद्ध दोहा पढ़ा। दोहा सुनते ही तुलसीदास जी अपने प्रभु को पहचान गए। तब प्रभु राम ने स्वयं अपने हाथ से तिलक लगाकर तुलसीदास जी को कृतार्थ किया और भक्ति का अनुपम वरदान दिया।
भगवान शिव और माता पार्वती की प्रेरणा से तुलसीदास जी ने अयोध्या में रामनवमी के दिन मानस की रचना शुरू की थी। इस महान ग्रंथ को पूरा करने में 2 वर्ष, 7 महीने और 26 दिन का समय लगा। विवाह पंचमी के दिन सातों कांड पूर्ण हुए, जिसके बाद यह ग्रंथ जन-जन का कंठहार बन गया।