सामान्य दुकान में बाल कटवाने पर घिरे मुख्यमंत्री सुक्खू, विपक्ष के आरोपों के बीच सादगी और सुरक्षा पर दी सफाई

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Shimla News: हिमाचल प्रदेश के मुख्यमंत्री सुखविंदर सिंह सुक्खू एक साधारण सैलून में बाल कटवाने को लेकर सियासी चर्चा के केंद्र में हैं। चंबा दौरे पर आम दुकान पर हेयरकट कराने पर विपक्ष ने सवाल उठाए। इसके बाद मुख्यमंत्री ने एक टीवी इंटरव्यू में अपनी जीवनशैली और सुरक्षा पर बेबाकी से जवाब दिया।

सुखविंदर सिंह सुक्खू ने स्पष्ट किया कि साधारण नाई की दुकान पर बाल कटवाना उनके लिए कोई नई बात नहीं है। वे हमेशा से आम दुकानों में ही बाल कटवाते आए हैं। उन्होंने बताया कि वे सोशल मीडिया से दूर रहते हैं और अपने काम में व्यस्त रहते हैं।

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अपनी सुरक्षा पर बोलते हुए सुक्खू ने कहा कि करियर के शुरुआती दौर में उनके पास पीएसओ तक नहीं था। तीन-चार चुनाव जीतने के बाद उन्हें सुरक्षा मिली। मुख्यमंत्री बनने के बाद भी वे अपनी सुरक्षा व्यवस्था को न्यूनतम रखने का प्रयास करते हैं ताकि जनता को असुविधा न हो।

मुख्यमंत्री के इस बयान का बड़ा राजनीतिक महत्व है। वे अपनी पुरानी जीवनशैली को ही अपनी सियासी पहचान के रूप में पेश कर रहे हैं। शिमला की सड़कों पर घूमना, पुराने अड्डों पर चाय-समोसा खाना और कॉफी हाउस में बैठना उनकी जीवनशैली का हिस्सा रहा है।

सुक्खू का कहना है कि यही उनका जीवन जीने का सामान्य तरीका है। वे इसे किसी राजनीतिक स्टंट के बजाय अपनी रोजमर्रा की दिनचर्या बताते हैं। हिमाचल जैसी पहाड़ी राजनीति में नेताओं का आम लोगों के बीच सहज दिखना उनकी जमीनी पकड़ को और अधिक मजबूत करता है।

विपक्ष इस घटना को सादगी के बजाय सोची-समझी ब्रांडिंग और पब्लिसिटी से जोड़कर देख रहा है। विपक्ष का सवाल है कि प्रोटोकॉल के बावजूद साधारण दुकान पर बाल कटवाने की तस्वीरें चर्चा में क्यों लाई गईं। इससे सादगी बनाम राजनीतिक प्रदर्शन की नई बहस छिड़ गई है।

राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि सत्ता में रहते हुए भी पुरानी दिनचर्या बनाए रखना जमीन से जुड़े होने का संकेत है। हालांकि, आलोचकों का कहना है कि सुरक्षा प्रोटोकॉल के बीच ऐसी तस्वीरों का सामने आना केवल एक राजनीतिक नैरेटिव बनाने का प्रयास भी हो सकता है।

सुक्खू हमेशा से अपनी राजनीति को जमीनी कार्यकर्ताओं और आम जनता से जोड़ते आए हैं। छात्र राजनीति के दिनों की दुकानों और कॉफी हाउस का जिक्र करना उनकी इसी शैली को दर्शाता है। वे दिखाना चाहते हैं कि पद बदलने से उनका स्वभाव नहीं बदला है।

हालांकि सादगी की इस राजनीति की असली कसौटी केवल बयानों या तस्वीरों से तय नहीं होती। जनता के लिए असली मुद्दे रोजगार, महंगाई, विकास, सड़क, स्वास्थ्य और शिक्षा हैं। आम लोगों के साथ चाय पीने से ज्यादा महत्वपूर्ण प्रशासनिक जवाबदेही और नीतियां होती हैं।

चंबा के सैलून की यह घटना भले ही छोटी लगे, लेकिन यह मुख्यमंत्री की जन छवि पर बहस का कारण बन गई है। समर्थकों के लिए वे ‘आम आदमी के मुख्यमंत्री’ हैं, जबकि विरोधियों के लिए यह अपनी छवि चमकाने का एक जरिया मात्र है।

आम नाई की दुकान से शुरू हुई यह चर्चा एक बड़े सवाल को जन्म देती है। क्या सत्ता के शीर्ष पर पहुंचकर भी कोई नेता आम इंसान बना रह सकता है, या सादगी भी अब सियासत का एक अहम हिस्सा बन चुकी है?

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Right News Desk
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लॉ और पत्रकारिता स्नातक, पत्रकारिता में 11 वर्ष का अनुभव

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