Prayagraj News: इलाहाबाद हाईकोर्ट के न्यायमूर्ति अतुल श्रीधरन ने देश में बढ़ते भ्रष्टाचार पर कड़ा रुख अपनाया है। उन्होंने कहा कि राम मंदिर में दान चोरी होने से भी लोग शर्मिंदा नहीं हैं, जो बेईमानी का सबसे निचला स्तर है। उन्होंने भ्रष्टाचार के दोषियों को मृत्युदंड देने का सुझाव दिया है।
यह तल्ख टिप्पणी हमीरपुर के फैमुद्दीन और दो अन्य याचियों की याचिका पर सुनवाई के दौरान सामने आई। याचियों ने प्रशासन द्वारा संभावित बुलडोजर कार्रवाई से सुरक्षा मांगी थी। न्यायमूर्ति श्रीधरन और न्यायमूर्ति सिद्धार्थनंदन की पीठ ने इस केस की सुनवाई की, जिसके बाद फैसला विभाजित हो गया।
51 पेज के फैसले में भ्रष्टाचार और बेईमानी पर हमला
न्यायमूर्ति अतुल श्रीधरन ने 51 पन्नों के अपने निर्णय में लिखा कि आम भारतीय ने भ्रष्टाचार को रोजमर्रा की जिंदगी का हिस्सा बना लिया है। ट्रांसपेरेंसी इंटरनेशनल की 2025 की रिपोर्ट में भारत 182 देशों में 91वें स्थान पर है। इसके बावजूद सार्वजनिक जीवन में कोई शर्मिंदगी नजर नहीं आती।
पीठ ने कहा कि भ्रष्ट अधिकारियों की सांठगांठ से बिल्डर अवैध निर्माण करते हैं। अधिकारी रिश्वत लेकर आंखें बंद कर लेते हैं, लेकिन जब कार्रवाई होती है तो खरीदार सड़क पर आ जाता है। कोर्ट ने कहा कि अवैध कब्जे गिराते समय दोषी अफसरों पर भी उतनी ही सख्त कार्रवाई होनी चाहिए।
एफआईआर के बाद घर गिराने पर जजों में असहमति
याचियों के रिश्तेदार आफान खान पर पोक्सो और धर्मांतरण का आरोप है। याचियों का कहना है कि आरोपी का उनकी संपत्ति में कोई हिस्सा नहीं है, फिर भी उसे सील किया जा रहा है। सरकार का तर्क है कि फैमुद्दीन भी जेल में रहा है और उसने कोर्ट से तथ्य छिपाए हैं।
न्यायमूर्ति श्रीधरन ने निर्देश दिया कि केस दर्ज होने के दो साल तक आरोपी का घर न गिराया जाए। हालांकि न्यायमूर्ति सिद्धार्थनंदन ने इससे असहमति जताई। उन्होंने कहा कि हाईकोर्ट अनुच्छेद 226 के तहत समय-सीमा तय नहीं कर सकता। दोनों जजों में मतभेद के कारण मामला अब तीसरे जज को भेजा जाएगा।
