बिहार में शादी-ब्याह की शान बने ऑर्केस्ट्रा डांस का क्या है इतिहास? भिखारी ठाकुर के लौंडा नाच से ऐसे बदला स्वरूप

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Patna News: बिहार में शादी, मुंडन और मांगलिक आयोजनों में ऑर्केस्ट्रा डांस का आयोजन बेहद आम बात हो चुकी है। इन समारोहों में भोजपुरी गानों की धुन पर महिला कलाकारों के डांस का खूब क्रेज रहता है। लोक संस्कृति का प्रमुख हिस्सा बन चुके इस आधुनिक ऑर्केस्ट्रा की शुरुआत की दास्तान काफी दिलचस्प और ऐतिहासिक रही है।

भिखारी ठाकुर के पारंपरिक लौंडा नाच से जुड़ी हैं जड़ें

बिहार के मौजूदा ऑर्केस्ट्रा की जड़ें सदियों पुरानी पारंपरिक लोक-नाट्य शैली ‘लौंडा नाच’ से सीधे जुड़ी हुई हैं। भोजपुरी के शेक्सपियर कहे जाने वाले भिखारी ठाकुर ने सामाजिक कुरीतियों को मिटाने के लिए इसकी नींव रखी थी। पहले पारंपरिक वाद्य यंत्रों की थाप पर केवल पुरुष कलाकार ही महिलाओं का वेश धारण कर नृत्य और अभिनय प्रस्तुत करते थे।

समय बदलने के साथ ही इसमें व्यावसायिकता बढ़ी और अधिक कमाई के उद्देश्य से मंच पर महिलाओं को शामिल किया जाने लगा। निजी समारोहों में महिला कलाकारों की मांग तेजी से बढ़ने लगी। पारंपरिक वाद्यों का स्थान आधुनिक इलेक्ट्रॉनिक साउंड सिस्टम ने ले लिया। 1980 के दशक में फिल्मी कैसेट्स आने के बाद पारंपरिक लोकगीतों की जगह फिल्मी गानों ने ली।

सामाजिक प्रतिष्ठा और ग्रामीण मनोरंजन का प्रमुख साधन

ग्रामीण इलाकों में मनोरंजन के सीमित साधन होने के चलते खास पारिवारिक मौकों पर ऑर्केस्ट्रा पूरे गांव के लिए एक सामूहिक उत्सव बन जाता है। वर्तमान समय में वैवाहिक अवसरों पर भव्य ऑर्केस्ट्रा का आयोजन परिवार की आर्थिक संपन्नता और सामाजिक दबदबे का प्रतीक माना जाता है। सक्षम परिवार इसे अपनी प्रतिष्ठा से जोड़कर बड़े स्तर पर करवाते हैं।

शुरुआती दौर में लोक कलाओं का मुख्य उद्देश्य समाज को दहेज, नशाखोरी और पलायन जैसी गंभीर समस्याओं के प्रति जागरूक करना था। हालांकि आधुनिकता की अंधी दौड़ में इस कला का मूल सामाजिक संदेश पीछे छूट गया। अब पारंपरिक लोक विधाओं के स्थान पर फूहड़ता, अश्लील गीतों, नर्तकियों के साथ दुर्व्यवहार और मानव तस्करी जैसी गंभीर चिंताएं भी उभर आई हैं।

Desh Raj
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