Shimla News: हिमाचल प्रदेश के चिड़ियाघर और वन्यजीव केंद्र गहरे वित्तीय संकट के दौर से गुजर रहे हैं। वन विभाग की वर्ष 2025-26 की वार्षिक रिपोर्ट के अनुसार, प्रदेशभर के चिड़ियाघरों का सालाना खर्च 6.94 करोड़ रुपये रहा, जबकि वे अपनी आय से मात्र 1.65 करोड़ रुपये ही जुटा पाए। कुफरी को छोड़कर अधिकांश केंद्र सरकारी अनुदान के सहारे चल रहे हैं।
हिमाचल प्रदेश में संचालित चिड़ियाघर और वन्यजीव केंद्र भारी घाटे का सामना कर रहे हैं। इन केंद्रों की अपनी आय इतनी कम है कि रोजमर्रा के खर्चे भी पूरे नहीं हो पा रहे हैं। हालात यह हैं कि अधिकांश केंद्रों के संचालन और रख-रखाव के लिए वन विभाग को पूरी तरह सरकारी वित्तीय सहायता (ग्रांट इन एड) पर निर्भर रहना पड़ रहा है।
वन विभाग की ओर से जारी वर्ष 2025-26 की वार्षिक रिपोर्ट के अनुसार, प्रदेश के चिड़ियाघरों के नेटवर्क ने एक वर्ष में करीब 1.65 करोड़ रुपये का राजस्व अर्जित किया, जबकि इनके संचालन पर कुल 6.94 करोड़ रुपये खर्च हुए। इस घाटे की भरपाई के लिए विभाग को सरकार से ग्रांट इन एड के रूप में 4 करोड़ रुपये की वित्तीय सहायता मिली। चिड़ियाघरों की आय का मुख्य जरिया पर्यटकों से मिलने वाला प्रवेश शुल्क, पार्किंग, दुकानों व कैफेटेरिया का किराया, वन विश्राम गृह और स्मृति चिन्हों की बिक्री है। हालांकि, वन्यजीवों के भोजन, दवाइयों, बिजली-पानी, कर्मियों के वेतन और बाड़ों के रख-रखाव पर होने वाला खर्च आय के मुकाबले कई गुना अधिक है।
कुफरी नेचर पार्क मुनाफे में, सराहन पीजेंट्री की हालत खस्ता
वित्तीय संकट के बीच शिमला के कुफरी स्थित हिमालयन नेचर पार्क एकमात्र अपवाद साबित हुआ है, जिसकी आय उसके खर्च से अधिक दर्ज की गई। वित्त वर्ष 2025-26 में इस पार्क ने कुल 1,02,34,897 रुपये का राजस्व अर्जित किया। इसमें ऑनलाइन और ऑफलाइन टिकट बिक्री से 94,04,230 रुपये प्राप्त हुए। इसके अलावा थ्री-डी थिएटर, कार पार्किंग, कैफेटेरिया, रेस्ट हाउस और स्मृति चिन्हों की दुकान से भी अच्छी आमदनी हुई। इस दौरान पार्क का कुल खर्च 61,51,097 रुपये रहा।
इसके विपरीत, सराहन स्थित पीजेंट्री में पर्यटकों के प्रवेश से पूरे वर्ष में मात्र 4,910 रुपये की आय हुई, जबकि केंद्र के संचालन और रख-रखाव पर कुल 11,40,000 रुपये खर्च किए गए।
रेणुका जी और रिवालसर में आय कुल खर्च का महज चार फीसदी
सिरमौर स्थित रेणुका जी मिनी चिड़ियाघर और मंडी के रिवालसर चिड़ियाघर में स्थिति बेहद चिंताजनक है। यहां की अपनी आय कुल खर्च का महज चार प्रतिशत ही है।
रेणुका जी मिनी जू में रेस्ट हाउस से 3,19,500 रुपये और टिकटों से 22,805 रुपये की राशि मिली, जबकि पशुओं के भोजन, दवाइयों और बाघों के बाड़े के निर्माण जैसे कार्यों पर 77,50,864 रुपये खर्च हुए।
मंडी जिले के रिवालसर स्थित मिनी चिड़ियाघर में वर्ष भर में 18,688 पर्यटक पहुंचे। यहां प्रवेश शुल्क और स्मृति चिन्हों की बिक्री से कुल 3,59,300 रुपये की कमाई हुई। इसके मुकाबले चिड़ियाघर पर कुल 88,80,000 रुपये खर्च हुए, जिसमें वन्यजीवों के चारे-खाद्य सामग्री पर 19 लाख और बाड़ों, परिसर विकास, मुख्य द्वार व बुनियादी ढांचे पर 69.80 लाख रुपये का व्यय शामिल है।
गोपालपुर चिड़ियाघर और चौड़ा मैदान पार्क का वित्तीय ब्योरा
कांगड़ा जिले के गोपालपुर स्थित धौलाधार नेचर पार्क ने वित्त वर्ष 2025-26 में 59,74,656 रुपये की आय अर्जित की। इसमें टिकट व पार्किंग से 55,75,715 रुपये, दुकानों व कैफे के किराए से 3,09,816 रुपये, वन्यजीव गोद लेने की योजना से 60,000 रुपये और रेस्ट हाउस से 29,125 रुपये मिले। इसके मुकाबले गोपालपुर पार्क और प्रबंधन केंद्रों पर कुल 2,44,61,053 रुपये खर्च हुए।
शिमला के चौड़ा मैदान स्थित हिमालयन बर्ड पार्क को टिकटों की बिक्री से 2,27,965 रुपये और स्मृति चिन्हों से 1,519 रुपये सहित कुल 2,29,484 रुपये की आय हुई। वहीं पक्षियों के फल-सब्जियों, अनाज, सूखी घास, बिजली और टिकट बुकलेट की व्यवस्था पर कुल 5,54,486 रुपये का खर्च दर्ज किया गया।