हिमाचल प्रदेश हाई कोर्ट का बड़ा फैसला, वित्तीय तंगी या जांच का बहाना बनाकर निजी अस्पतालों के बिल नहीं रोक सकती सरकार

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Shimla News: हिमाचल प्रदेश हाई कोर्ट ने राज्य सरकार को बड़ा झटका दिया है। अदालत ने साफ किया कि सरकार आर्थिक संकट या जांच का बहाना बनाकर निजी अस्पतालों के सत्यापित बिलों का भुगतान नहीं रोक सकती। कोर्ट ने इसे संविधान के अनुच्छेद 300(ए) और अनुच्छेद 21 का उल्लंघन करार दिया है।

न्यायाधीश ज्योत्सना रिवाल दुआ ने मैसर्स मातृ मेडिसिटी समेत 34 निजी अस्पतालों की याचिकाओं पर यह फैसला सुनाया। ये सभी अस्पताल केंद्र की आयुष्मान भारत और राज्य की हिमकेयर योजना से जुड़े हैं। अस्पतालों ने सरकार पर कई सालों से वैध दावों का भुगतान न करने और नकद प्रवाह ठप करने का आरोप लगाया था।

अदालत ने खारिज की केंद्र और राज्य सरकार की दलीलें

मामले की सुनवाई के दौरान दोनों सरकारों और स्वास्थ्य विभाग ने अपनी दलीलें दीं, लेकिन अदालत ने उन्हें खारिज कर दिया। सरकार ने 30 मई 2026 को पत्र जारी कर विजिलेंस जांच का हवाला दिया था। इसके तहत हिमकेयर बिलों में धोखाधड़ी की आशंका के चलते जांच पूरी होने तक भुगतान पर रोक लगा दी गई थी।

हाई कोर्ट ने सरकार के इस रवैये को कल्याणकारी राज्य के सिद्धांतों का मजाक बताया। कोर्ट ने कहा कि सरकार 2018 से योजना की शर्तों से अच्छी तरह वाकिफ थी। अब अनुबंध पर हस्ताक्षर करने के बाद वह इसे अव्यावहारिक नहीं बता सकती। केवल याचिकाकर्ता अस्पतालों के ही करीब 11.03 करोड़ रुपये के बिल लंबित हैं।

स्वीकृत बिलों का तुरंत भुगतान करने के सख्त निर्देश

अदालत ने आदेश दिया कि आयुष्मान भारत योजना के तहत स्वीकृत सभी बकाया बिलों का तुरंत भुगतान किया जाए। इसके साथ ही हिमकेयर योजना के तहत सितंबर 2024 के बाद के डायलिसिस मामलों सहित सभी लंबित स्वीकृत राशियों को बिना किसी देरी के सीधे अस्पतालों के बैंक खातों में ट्रांसफर करने के सख्त निर्देश दिए गए हैं।

अदालत ने स्वास्थ्य विभाग को बिलों के तेजी से सत्यापन के लिए गठित डॉक्टरों की अतिरिक्त टीम को तय समयसीमा के भीतर सारा काम पूरा करने का निर्देश दिया है। इस फैसले से राज्य के दर्जनों निजी अस्पतालों और उनमें इलाज कराने वाले हजारों गरीब मरीजों को बड़ी राहत मिलने की उम्मीद है।

Right News Desk
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