हिमाचल हाईकोर्ट की सख्त टिप्पणी: लापरवाही से फैसला सुनाने वाले न्यायिक अधिकारी को विशेष ट्रेनिंग के निर्देश

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Shimla News: हिमाचल प्रदेश हाईकोर्ट ने मोटर दुर्घटना दावा न्यायाधिकरण (MACT) के मामले में लापरवाही से फैसला सुनाने पर एक जिला एवं सत्र न्यायाधीश के प्रति कड़ी नाराजगी जताई है। अदालत ने न्यायिक अधिकारी के आदेश को मोटर वाहन अधिनियम के प्राथमिक ज्ञान की कमी और ‘दिमाग का बिल्कुल इस्तेमाल न करना’ करार दिया है।

न्यायाधीश सुशील कुकरेजा ने मामले की सुनवाई करते हुए निर्देश दिए कि इस फैसले की एक प्रति संबंधित न्यायिक अधिकारी के सर्विस रिकॉर्ड में दर्ज की जाए। इसके साथ ही, अधिकारी को हिमाचल प्रदेश राज्य न्यायिक अकादमी में विशेष ट्रेनिंग और रिफ्रेशर कोर्स के लिए भेजने का भी निर्देश दिया गया है। अदालत ने बीमा कंपनी की अपील को स्वीकार करते हुए उसे मुआवजा राशि चुकाने की जिम्मेदारी से पूरी तरह मुक्त कर दिया है।

ट्रायल कोर्ट के जज से सामने आईं दो गंभीर गलतियां

हाईकोर्ट की समीक्षा में ट्रायल कोर्ट के जज की दो बड़ी लापरवाहियां और गलतियां सामने आईं।

  • गलत बीमा पॉलिसी: दुर्घटना 30 दिसंबर 2016 को हुई थी, लेकिन जज ने फैसले में एक ऐसी पुरानी बीमा पॉलिसी को आधार बना लिया जो सितंबर 2015 से सितंबर 2016 तक ही वैध थी, जबकि घटना के समय दूसरी पॉलिसी लागू थी। वाहन की यह पॉलिसी केवल ‘थर्ड पार्टी लायबिलिटी पॉलिसी’ थी, जिसके लिए कोई अतिरिक्त प्रीमियम नहीं दिया गया था।
  • कानूनी नियमों की अनदेखी: सुप्रीम कोर्ट के स्थापित कानूनों के अनुसार, एक्ट पॉलिसी में कार के भीतर बिना प्रीमियम दिए बैठे यात्री का जोखिम कवर नहीं होता है। इसके बावजूद ट्रायल कोर्ट ने बीमा कंपनी को मुआवजे का भुगतान करने का गलत आदेश दे दिया था।

क्या था पूरा मामला?

यह पूरा मामला 30 दिसंबर 2016 को सुंदरनगर (मंडी) के पास बेही-की-धार में हुई एक कार दुर्घटना से जुड़ा हुआ है। दुर्घटना के दौरान कार पहाड़ी से नीचे खेतों में गिर गई थी, जिसमें वाहन में सवार ‘त्रहरू उर्फ केशव’ की मौत हो गई थी। हाईकोर्ट के इस सख्त फैसले से न्यायिक प्रणाली में कानूनी दस्तावेजों और तथ्यों की गहन जांच की अनिवार्यता एक बार फिर स्पष्ट हुई है।

Mohit
Mohit
पत्रकारिता के क्षेत्र में 9 सालों का अनुभव।

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