Goa News: बॉम्बे हाईकोर्ट की गोवा पीठ ने केंद्रीय निर्वाचन आयोग को एक परिवार के छह सदस्यों के नाम 10 दिन के भीतर मतदाता सूची में बहाल करने का निर्देश दिया है। याचिकाकर्ताओं ने उसी विधानसभा क्षेत्र में घर बदलने के बाद फॉर्म-8 जमा किया था, जिसे स्वीकार न किए जाने पर उनके नाम सूची से कट गए थे।
बॉम्बे हाईकोर्ट की गोवा पीठ ने मतदाता सूची से हटाए गए नामों के मामले में केंद्रीय निर्वाचन आयोग को निर्देश देते हुए एक ही परिवार के छह सदस्यों के नाम 10 दिन के अंदर दोबारा शामिल करने का आदेश दिया है। अदालत ने आयोग की कार्यप्रणाली और सॉफ्टवेयर की तकनीकी व्यवस्था पर भी सवाल उठाए हैं। यह मामला गोवा के सांता क्रूज विधानसभा क्षेत्र से जुड़ा है, जहां याचिकाकर्ता परेश सालगांवकर और उनके परिवार के पांच अन्य सदस्यों के नाम एसआईआर (विशेष पुनरीक्षण) प्रक्रिया के दौरान सूची से हटा दिए गए थे।
घर बदलने के बाद फॉर्म-8 भरने पर भी कटे नाम
याचिकाकर्ता के वकील विवेक रोड्रिग्स के अनुसार परेश सालगांवकर वर्ष 1995 से लगातार मतदान कर रहे थे। हाल ही में उन्होंने उसी विधानसभा क्षेत्र में अपना घर बदला था। पते में बदलाव की विधिवत सूचना दर्ज कराने के लिए उन्होंने बूथ लेवल अधिकारी (बीएलओ) के निर्देशानुसार फॉर्म-8 जमा किया था। इसके बावजूद चुनाव आयोग के सिस्टम में इसे स्वीकार नहीं किया गया और पूरे परिवार के नाम मतदाता सूची से बाहर हो गए।
विभागीय स्तर पर अपील खारिज होने के बाद पीड़ित परिवार ने सितंबर में बॉम्बे हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया था, जिस पर 28 सितंबर से नियमित सुनवाई शुरू हुई।
जस्टिस वाल्मीकि मेनेजेस और अमित जामसांडेकर की पीठ का फैसला
जस्टिस वाल्मीकि मेनेजेस और जस्टिस अमित जामसांडेकर की खंडपीठ ने मामले की सुनवाई करते हुए चुनाव आयोग को निर्देश दिया कि वह सभी छह सदस्यों के नाम 10 दिन के भीतर मतदाता सूची में शामिल करे।
हाईकोर्ट के इस फैसले के बाद चुनाव आयोग की ओर से पेश वकील गौरिश अग्नि ने आदेश के अमल पर अंतरिम रोक लगाने की मांग की, ताकि आयोग इसके खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में अपील दायर कर सके। हालांकि, अदालत ने इस मांग को खारिज कर दिया। खंडपीठ ने स्पष्ट किया कि मामला पात्र नागरिकों को मतदाता सूची में शामिल करने से संबंधित है, इसलिए आदेश पर रोक लगाने का कोई वैध आधार नहीं बनता।
सॉफ्टवेयर की खामी और कानूनी अधिकारों पर अदालत की टिप्पणी
मामले की सुनवाई के दौरान अदालत ने आयोग से पूछा था कि जब परिवार ने पता बदलने के लिए निर्धारित फॉर्म-8 जमा कराया था, तो उसे क्यों नहीं स्वीकार किया गया। पीठ ने टिप्पणी की कि किसी भी सॉफ्टवेयर की तकनीकी खामी स्थापित कानूनी अधिकारों से ऊपर नहीं हो सकती। अदालत ने यह भी रेखांकित किया कि किसी भी वैध और पात्र मतदाता का नाम सूची से हटाने से पहले उसे अपनी बात रखने का अवसर मिलना आवश्यक है।
चुनाव आयोग का तर्क था कि एसआईआर प्रक्रिया के तहत मतदाता सूची नए सिरे से तैयार होती है, इसलिए जिनका नाम मसौदा सूची में नहीं आया, उन्हें अंतिम सूची के लिए नया फॉर्म-6 भरना अनिवार्य था। इसके विपरीत याचिकाकर्ताओं का कहना था कि वे दशकों से पंजीकृत मतदाता हैं, इसलिए उन्हें नए मतदाता के रूप में फॉर्म-6 भरने के लिए बाध्य करना अनुचित है। हाईकोर्ट के आदेश के बाद अब निर्वाचन अधिकारियों को निर्धारित समयसीमा में इनके नाम बहाल करने होंगे।