Shimla News: हिमाचल प्रदेश में 5500 करोड़ रुपये की सेब आर्थिकी पर जलवायु परिवर्तन का भारी संकट मंडरा रहा है. मौसम के बदलते मिजाज के कारण इस साल सेब उत्पादन में रिकॉर्ड गिरावट आई है. इससे राज्य के बागवानों की चिंता काफी बढ़ गई है. स्थानीय मंडियों में सेब की पेटियां बहुत कम पहुंच रही हैं.
हिमाचल प्रदेश की फल मंडियों में 14 सितंबर तक लगभग 95 लाख सेब की पेटियां ही पहुंची हैं. राज्य सरकार का अनुमान है कि पूरे सीजन के अंत तक यह आंकड़ा मुश्किल से 1.50 करोड़ पेटियों तक पहुंचेगा. जबकि पिछले साल राज्य में रिकॉर्ड 3.50 करोड़ से अधिक सेब की पेटियों का कारोबार हुआ था.
इस साल सेब का कुल उत्पादन पिछले साल की तुलना में आधा भी नहीं रहने की आशंका है. सर्दियों के दौरान कम ठंड और बर्फबारी न होना इसका मुख्य कारण है. इसके अलावा फ्लावरिंग के समय बेमौसम बारिश और ओलावृष्टि ने सेब की पूरी फसल को बहुत बुरी तरह नुकसान पहुंचाया है.
हिमाचल में पिछले दो दशकों से सेब उत्पादन में लगातार उतार-चढ़ाव देखा जा रहा है. हर तीसरे साल मौसम की खराबी से उत्पादन 50 प्रतिशत से नीचे चला जाता है. उत्पादन में अचानक आने वाली इस भारी गिरावट से बागवानों की सालाना कमाई और पूरे स्थानीय बिजनेस पर बेहद बुरा असर पड़ रहा है.
राज्य की अर्थव्यवस्था में सेब का बड़ा योगदान है और इससे 2.50 लाख से अधिक बागवान परिवार सीधे जुड़े हैं. इसके साथ ही सेब की प्रूनिंग, ग्रेडिंग, पैकिंग, ट्रांसपोर्टेशन और फल मंडियों में काम करने वाले लाखों लोगों की रोजी-रोटी भी पूरी तरह से इसी कारोबार पर निर्भर करती है.
प्रदेश के शिमला, कुल्लू, मंडी, किन्नौर, लाहौल-स्पीति, चंबा और सिरमौर जिलों में सेब की बड़े पैमाने पर खेती की जाती है. सेब एक टेंपरेट फ्रूट क्रॉप है, जिसे अच्छी पैदावार के लिए सर्दियों में पर्याप्त चिलिंग आवर्स की जरूरत होती है. पर्याप्त ठंड न मिलने से फ्लावरिंग और फ्रूट सेटिंग प्रभावित होती है.
पहाड़ी क्षेत्रों में सर्दियों के दौरान बर्फबारी का पैटर्न काफी तेजी से बदल रहा है. निचले और मध्यम ऊंचाई वाले इलाकों में तापमान बढ़ने से सेब के पौधों पर हीट स्ट्रैस का खतरा बढ़ रहा है. इस कारण पारंपरिक वैरायटी के सेब के बाग विकसित करना अब काफी चुनौतीपूर्ण साबित हो रहा है.
बढ़ते तापमान की वजह से अब पारंपरिक एप्पल बेल्ट धीरे-धीरे अधिक ऊंचाई वाले क्षेत्रों की ओर खिसक रही है. निचले इलाकों में मौसम अनुकूल न रहने से बागवान ऊंचे इलाकों में नए बाग लगा रहे हैं. ओलावृष्टि और नए प्रकार की बीमारियों से फसल को बचाने के लिए बागवानों का खर्च भी बढ़ा है.
पिछले 10 वर्षों में खाद, कीटनाशक, स्प्रे, कृषि उपकरण, पैकेजिंग मैटीरियल, मजदूरी और ट्रांसपोर्टेशन की लागत में भारी बढ़ोतरी हुई है. एक तरफ फसल का उत्पादन घट रहा है और दूसरी तरफ खेती की लागत बढ़ रही है. इससे बागवानों के लिए अपने नुकसान की भरपाई करना बेहद मुश्किल हो रहा है.
मुख्यमंत्री के प्रधान मीडिया सलाहकार नरेश चौहान ने कहा कि पिछले एक-दो दशकों से ग्लोबल वॉर्मिंग का असर साफ दिख रहा है. राज्य के 29 विधानसभा क्षेत्रों में सेब की बागवानी होती है. जलवायु परिवर्तन के कारण प्राकृतिक आपदाएं, ग्लेशियर पिघलना, अचानक बाढ़ और भूस्खलन जैसी घटनाएं तेजी से बढ़ी हैं.
नरेश चौहान के अनुसार मुख्यमंत्री ने बागवानी यूनिवर्सिटी के विशेषज्ञों को निर्देश दिए हैं कि वे ग्राउंड पर जाकर स्थिति का अध्ययन करें. विशेषज्ञ टीम यह पता लगाएगी कि बदलते मौसम के बीच सेब बागवानी को कैसे बचाया जा सकता है. बागवानों ने भी सरकार से इस खतरे को कम करने की गुहार लगाई है.
ग्लोबल लेवल पर बढ़ रहा ग्रीनहाउस गैस एमिशन और जीवाश्म ईंधन का अत्यधिक इस्तेमाल जलवायु परिवर्तन का मुख्य कारण है. इससे वातावरण में कार्बन डाइऑक्साइड बढ़ रही है और तापमान में वृद्धि हो रही है. हिमालयी क्षेत्र इस बदलाव के प्रति काफी संवेदनशील है, जिससे बर्फबारी और जल संसाधन प्रभावित हो रहे हैं.
हिमाचल प्रदेश में सेब केवल एक फल नहीं है, बल्कि यह पूरी ग्रामीण अर्थव्यवस्था की मजबूत रीढ़ है. 5500 करोड़ रुपये से अधिक की इस आर्थिकी का सीधा संबंध लाखों लोगों के रोजगार से है. यदि मौसम का मिजाज ऐसा ही रहा तो राज्य के सामने सेब आर्थिकी को बचाना सबसे बड़ी चुनौती होगी.