Delhi News: पिछले सप्ताह अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतों में भारी उतार-चढ़ाव दर्ज किया गया। अमेरिकी कच्चा तेल (WTI) 84 डॉलर प्रति बैरल के पास स्थिर बना हुआ है, लेकिन इस दौरान इसमें 8 डॉलर से अधिक की उछाल आई। मार्च के बाद से यह तेल की कीमतों में दर्ज की गई सबसे बड़ी तेजी है।
अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष (IMF) की प्रबंध निदेशक क्रिस्टालिना जॉर्जीवा ने मध्य पूर्व में जारी तनाव पर गंभीर चेतावनी दी है। उन्होंने कहा कि तेल संकट वैश्विक अर्थव्यवस्था को मंदी की ओर ले जा सकता है। हालांकि, अगर स्ट्रेट ऑफ होर्मुज का रास्ता जल्दी खुल जाता है तो इस संकट का प्रभाव कम हो सकता है।
मध्य पूर्व और होर्मुज में तनाव से बढ़ीं तेल की कीमतें
अमेरिका और ईरान के बीच जारी संघर्ष के कारण होर्मुज जलडमरूमध्य से होने वाली तेल आपूर्ति बाधित हुई है। दुनिया के कुल तेल व्यापार का लगभग 20 प्रतिशत हिस्सा इसी रास्ते से गुजरता है। इस महत्वपूर्ण समुद्री मार्ग में किसी भी प्रकार की रुकावट का सीधा और गहरा असर वैश्विक अर्थव्यवस्था पर पड़ता है।
सऊदी अरब ने लाल सागर में सुरक्षा के लिए 43 देशों के साथ गठबंधन पर चर्चा की है। यह कदम हूती विद्रोहियों द्वारा लगाई गई नाकाबंदी के जवाब में उठाया गया है। दूसरी ओर, हूती नेता अब्दुलमलिक अल-हूती ने चेतावनी दी है कि यदि सऊदी अरब हमले करता है तो वे और कड़ा जवाब देंगे।
काला सागर संकट और अमेरिकी राष्ट्रपति के सामने चुनौती
मध्य पूर्व के अलावा काला सागर में भी तेल सप्लाई को लेकर चिंताएं बढ़ गई हैं। कजाकिस्तान के तेल निर्यात के लिए महत्वपूर्ण टर्मिनल पर लोडिंग रोक दी गई है। इस महीने कैस्पियन पाइपलाइन कंसोर्टियम सुविधा के जहाजों पर कई हमले हुए हैं, जो 2022 के बाद सबसे अधिक हैं।
अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के सामने अब दो कठिन विकल्प हैं। उन्हें ईरान के हमलों का जवाब देकर युद्ध बढ़ाने या ग्लोबल एनर्जी मार्केट की अनिश्चितता को शांत करने में से एक चुनना होगा। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि स्थिति और बिगड़ती है तो तेल बाजार में संकट और बढ़ सकता है।
बढ़ती कीमतों का आम आदमी और भारत पर प्रभाव
तेल की कीमतों में बढ़ोतरी का सीधा असर आम जनता की जेब पर पड़ता है। ईंधन के दाम बढ़ने से परिवहन लागत में इजाफा होता है, जिससे आवश्यक वस्तुओं और खाने-पीने की चीजों की कीमतें बढ़ जाती हैं।
यदि कच्चे तेल की कीमतें 100 डॉलर प्रति बैरल के पार जाती हैं, तो भारत जैसे प्रमुख तेल आयातक देशों पर महंगाई का दबाव काफी बढ़ जाएगा। बाजार विशेषज्ञों का अनुमान है कि जब तक युद्ध जारी रहेगा, तब तक तेल की कीमतों में अनिश्चितता और तेजी बनी रहेगी।