Kathmandu News: नेपाल-तिब्बत सीमा पर हाल ही में आई विनाशकारी बाढ़ को लेकर भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (इसरो) के सैटेलाइट विश्लेषण में चौंकाने वाला खुलासा हुआ है। लगभग 5,200 मीटर की ऊंचाई पर स्थित एक विशाल ग्लेशियर का दो-तिहाई हिस्सा अचानक टूटकर ल्हेंडे खोला नदी घाटी में गिर गया था।
इसरो के नेशनल रिमोट सेंसिंग सेंटर (एनआरएससी) द्वारा जारी सेंटinel-2 और लैंडसैट-9 की तस्वीरों के तुलनात्मक अध्ययन से इस घटना की पुष्टि हुई है। 24 अगस्त को पूरी तरह सुरक्षित दिखने वाला ग्लेशियर 26 अगस्त की आपदा के बाद पूरी तरह क्षतिग्रस्त और टूटा हुआ नजर आया।
1.2 किमी नीचे गिरकर मलबे में बदला बर्फ का पहाड़
कैलगरी यूनिवर्सिटी के भू-आकृति वैज्ञानिक डेनियल शुगार के अनुसार, ग्लेशियर से बर्फ का विशाल द्रव्यमान टूटकर लगभग 1.2 किलोमीटर लंबवत नीचे घाटी के तल पर गिरा। अत्यधिक ऊंचाई से गिरने के कारण भारी गुरुत्वाकर्षण ऊर्जा गति में बदल गई, जिससे बर्फ का यह खंड टुकड़ों में बिखर गया।
अर्थ साइंसेज न्यूजीलैंड के प्रमुख वैज्ञानिक साइमन कॉक्स ने बताया कि नीचे गिरते ही इस बर्फ ने रास्ते की चट्टानों, मिट्टी और पेड़ों को अपनी चपेट में ले लिया। इस चेन रिएक्शन ने एक विशाल एवलांच का रूप ले लिया, जिसने ल्हेंडे खोला नदी के प्राकृतिक बहाव को पूरी तरह रोक दिया।
तरल कंक्रीट जैसा था मलबे और पानी का तेज सैलाब
टेक्सास यूनिवर्सिटी के हाइड्रोलॉजिस्ट हातिम शरीफ ने बताया कि यह कोई सामान्य बाढ़ नहीं थी, बल्कि यह पानी और गाद का मिश्रण तरल कंक्रीट की तरह बह रहा था। अत्यधिक घनत्व और तीव्र गति के कारण इसने रास्ते में आए पुलों, भारी वाहनों और विशाल चट्टानों को आसानी से बहा दिया।
नदी में पानी और मलबे का भारी दबाव अचानक फटने से भोटे कोशी-त्रिशूली कॉरिडोर में भीषण सैलाब आ गया। वैज्ञानिकों के अनुसार, ग्लेशियर के ढहने और चट्टानों के गिरने का यह प्रभाव इतना अधिक शक्तिशाली था कि इसकी तीव्रता भूकंप मापक यंत्रों (सीस्मोग्राफ) पर भी दर्ज की गई।