Dharmik News: हिंदू धर्म में श्रावण मास के शुक्ल पक्ष की एकादशी का विशेष महत्व है, जिसे ‘श्रावण पुत्रदा एकादशी’ कहा जाता है। मान्यता है कि संतान सुख से वंचित विवाहित जोड़े यदि इस दिन पूरे नियमों के साथ भगवान विष्णु की पूजा करते हैं, तो उन्हें योग्य संतान की प्राप्ति होती है।
पापों के नाश और मोक्ष प्राप्ति का साधन
धार्मिक मान्यताओं के अनुसार श्रावण पुत्रदा एकादशी का व्रत संतान प्राप्ति के साथ जीवन के समस्त संकटों को दूर करता है। इस दिन श्रद्धापूर्वक भगवान विष्णु की आराधना करने से भक्तों के सभी पाप मिट जाते हैं। घर में सुख-समृद्धि आती है और साधक को अंत में मोक्ष की प्राप्ति होती है।
राजा सुकेतुमान और रानी शैव्या की पौराणिक कथा
पौराणिक कथा के अनुसार भद्रावती नगरी के धर्मात्मा राजा सुकेतुमान संतान न होने के कारण बेहद दुखी रहते थे। पुत्रहीन होने के चलते वे देव ऋण और पितृ ऋण से मुक्ति को लेकर चिंतित थे। निराशा में वे जंगल पहुंचे, जहां एक सरोवर के निकट विश्वदेव ऋषियों ने उन्हें पुत्रदा एकादशी व्रत का मार्ग बताया।
ऋषियों के बताए नियमों के अनुसार राजा और रानी ने पूरी निष्ठा से पुत्रदा एकादशी का व्रत रखा। इस व्रत के पुण्य प्रभाव से रानी ने एक तेजस्वी पुत्र को जन्म दिया। इस प्रकार राजा के वंश की रक्षा हुई और पितर भी तृप्त हुए। शास्त्रों में यह व्रत संतान प्राप्ति के लिए अचूक माना गया है।