New Delhi News: सुप्रीम कोर्ट ने विधानसभा और लोकसभा में अनुसूचित जाति (SC) और अनुसूचित जनजाति (ST) के लिए आरक्षित सीटों के रोटेशन की मांग वाली याचिका खारिज कर दी है। मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत और जस्टिस जॉयमाल्य बागची की पीठ ने स्पष्ट किया कि निर्वाचन क्षेत्रों के रोटेशन का निर्णय संसद और विधायिका के अधिकार क्षेत्र में आता है, अदालत संसद के तीसरे सदन की भूमिका नहीं निभा सकती।
सुप्रीम कोर्ट ने बुधवार को विधानसभा और संसदीय क्षेत्रों में एससी और एसटी वर्ग के लिए आरक्षित सीटों को समय-समय पर बदलने (रोटेशन व्यवस्था लागू करने) की मांग वाली याचिका पर विचार करने से इनकार करते हुए उसे खारिज कर दिया। मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत और जस्टिस जॉयमाल्य बागची की पीठ ने सुनवाई के दौरान याचिकाकर्ता को विधायी संस्थाओं के समक्ष अपनी बात रखने की स्वतंत्रता दी। मुख्य न्यायाधीश ने हल्के-फुल्के अंदाज में टिप्पणी करते हुए कहा कि याचिकाकर्ता ने गलत जगह दरवाजा खटखटाया है, उन्हें अपनी बात संसद और जनप्रतिनिधियों तक पहुंचानी चाहिए क्योंकि अदालत देश चलाने या संसद की जगह निर्णय लेने का काम नहीं कर सकती।
1952 से आरक्षित यूपी की कादीपुर सीट को लेकर दायर हुई थी याचिका
यह मामला उत्तर प्रदेश के सुल्तानपुर जिले की 191-कादीपुर विधानसभा सीट से जुड़े मतदाता जगदीश सिंह द्वारा दायर किया गया था। याचिकाकर्ता का तर्क था कि कादीपुर सीट वर्ष 1952 में हुए पहले चुनाव से ही लगातार अनुसूचित जाति के लिए आरक्षित रखी गई है। उनका आरोप था कि दशकों से आरक्षण बरकरार रहने के चलते सिर्फ गिने-चुने परिवारों को ही बार-बार चुनाव लड़ने का मौका मिल रहा है और आम मतदाताओं के लिए विकल्प सीमित हो गए हैं। याचिका में परिसीमन अधिनियम की धारा 9(1)(c) का उल्लेख करते हुए इसे संविधान के अनुच्छेद 14, 15 और 19 के उल्लंघन के आधार पर चुनौती दी गई थी।
स्थानीय निकायों और विधानसभा-संसद के आरक्षण ढांचे में अंतर
याचिकाकर्ता के वकील ने संविधान के अनुच्छेद 243D और 243T का हवाला देते हुए दलील दी कि जिस प्रकार पंचायत और नगर निकाय चुनावों में आरक्षण के रोटेशन की वैधानिक व्यवस्था है, उसी तर्ज पर विधानसभा और लोकसभा क्षेत्रों में भी रोटेशन लागू किया जाना चाहिए। इस पर पीठ ने असहमति जताते हुए कहा कि स्थानीय निकायों और विधायी सदनों (संसद व विधानसभा) के चुनाव व आरक्षण का संवैधानिक ढांचा पूरी तरह भिन्न है। अदालत संविधान के प्रावधानों को दोबारा लिखकर उनमें अपनी तरफ से रोटेशन की नई शर्तें नहीं जोड़ सकती।
अदालत संसद का तीसरा सदन नहीं बन सकती: पीठ
पीठ के सदस्य जस्टिस जॉयमाल्य बागची ने स्पष्ट किया कि अदालत संसद के तीसरे सदन के रूप में कार्य नहीं कर सकती। यदि किसी कानून में स्पष्ट मनमानी हो तो उसकी संवैधानिकता जांची जा सकती है, लेकिन सिर्फ इसलिए किसी कानूनी व्यवस्था को असंवैधानिक नहीं कहा जा सकता कि उसमें बदलाव की मांग की जा रही है।
जस्टिस बागची ने यह भी रेखांकित किया कि किसी निर्वाचन क्षेत्र के आरक्षित होने से नागरिकों का मतदान का संवैधानिक अधिकार समाप्त नहीं होता। बहुदलीय लोकतांत्रिक व्यवस्था में मतदाता केवल जाति के आधार पर नहीं, बल्कि राजनीतिक दलों और उनकी नीतियों के आधार पर भी मतदान करते हैं। साथ ही, किसी आरक्षित सीट से चुनाव न लड़ पाने वाला व्यक्ति अन्य सामान्य सीटों से चुनाव लड़ने के लिए स्वतंत्र रहता है।
शीर्ष अदालत ने परिसीमन आयोग की 2008 की सिफारिशों के संदर्भ में कहा कि वे प्रक्रियात्मक दिशा-निर्देश हैं, जिनसे लगातार रोटेशन की अनिवार्यता नहीं बनती। अदालत ने हाई कोर्ट के पूर्व आदेश में हस्तक्षेप करने से इनकार करते हुए याचिका खारिज कर दी और याचिकाकर्ता को जनप्रतिनिधियों के माध्यम से विधायी स्तर पर अपनी मांग उठाने की छूट दी।