New Delhi News: भारतीय समाज में शादी के बाद बच्चे पैदा न करने का फैसला अक्सर आलोचना का शिकार बनता है। ऐसे दंपतियों को समाज अक्सर स्वार्थी मान लेता है। हालांकि, नए वैज्ञानिक अध्ययन और मनोवैज्ञानिक शोध इस सोच को गलत साबित करते हुए इसे पूरी तरह निजी और सकारात्मक विकल्प बताते हैं।
रिसर्च ने खारिज किए पछतावे और दुख के दावे
अक्सर माना जाता है कि बच्चे न होने पर बुढ़ापे में पछतावा होगा या जीवन में खालीपन रहेगा। साल 2022 में 15 अध्ययनों के एक विस्तृत रिव्यू में पाया गया कि बिना बच्चों के रहने वाले लोग जीवन में कम खुश या असंतुष्ट नहीं रहते। यह फैसला उनके निजी लक्ष्यों और प्राथमिकताओं पर निर्भर करता है।
इच्छा से बच्चे न चाहना और मजबूरी में बड़ा अंतर
समाज को यह समझना होगा कि स्वेच्छा से बिना बच्चे के रहना और शारीरिक समस्याओं के कारण बच्चे न हो पाना, दोनों अलग बातें हैं। कुछ दंपती अपनी मर्जी से यह राह चुनते हैं। वहीं, कुछ लोग संतान चाहते हुए भी चिकित्सीय या इनफर्टिलिटी संबंधी कारणों से माता-पिता नहीं बन पाते हैं।
आत्मनिर्णय सिद्धांत और संतुष्टि की अलग परिभाषाएं
मनोवैज्ञानिक एडवर्ड डेसी और रिचर्ड रयान का सेल्फ-डिटरमिनेशन सिद्धांत बताता है कि इंसान तब अधिक संतुष्ट रहता है, जब वह जीवन के निर्णय अपने मूल्यों पर लेता है। मनोविज्ञान के अनुसार संतुष्टि हर व्यक्ति के लिए अलग हो सकती है, जो करियर, रचनात्मकता, यात्रा या परिवार से मिल सकती है।