Bilaspur News: देशभर में गुग्गा नवमी का पावन पर्व पूर्ण श्रद्धा के साथ मनाया जा रहा है। पंजाब के नकोदर से लेकर हिमाचल प्रदेश के बिलासपुर जिले तक भव्य मेलों का आयोजन हो रहा है। लोक कथाओं के अनुसार, माता बाछल की मन्नतों के बावजूद गुग्गावीर धरती की गोद में समा गए थे।
कहा जाता है कि ददरेड़ा नगरी के एक ग्वाले ने गुग्गा जी की प्रिय गाय को उस स्थान पर दूध पिलाते देखा था, जहां वे समाए थे। जब यह बात उनकी पत्नी श्रीयल को पता चली, तो वे वहां जाकर रोने लगीं। इसके बाद धरती दोबारा फटी और श्रीयल भी वहीं समा गईं, जिसे आज ‘श्रीयल जाल’ कहा जाता है।
सर्पों का विष पीने के कारण कहलाए जाहरवीर
गुग्गा जी ने सर्पों और नागों का विष पी लिया था, जिसके कारण उन्हें ‘जाहरवीर’ कहा गया। प्राचीन समय से ही उन्हें देवता की तरह पूजा जाता है। हिंदू ही नहीं, बल्कि मुस्लिम समुदाय के लोग भी उनके चमत्कारों से प्रभावित होकर उन्हें पीर-पैगंबर की तरह पूजते हैं।
गुग्गा मैड़ी भवन से एक बेहद रोचक ऐतिहासिक घटना जुड़ी हुई है। दिल्ली के बादशाह नौशेबरा ने एक बार युद्ध में सफलता मिलने पर गुग्गा मैड़ी पर पक्की दरगाह बनवाने की मन्नत मांगी थी। सफलता मिलने के बाद जब बादशाह अपनी मन्नत भूल गया, तो उसकी फौज के आगे विशालकाय नाग आ गए।
बादशाह नौशेबरा और नागों के भय की कथा
नागों को देखकर भयभीत हुए बादशाह ने तुरंत अपनी पलटन को दरगाह निर्माण का आदेश दिया। भादरा से लेकर मैड़ी भवन तक सैनिकों की कतार लगाकर इस दरगाह का निर्माण कराया गया। जैसे ही भवन का निर्माण पूरा हुआ, सभी नाग देवता वापस धरती में समा गए।
आज भी दूर-दूर से श्रद्धालु इस मैड़ी भवन में माथा टेकने आते हैं। मान्यता है कि यहां आने वाले किसी भी भक्त की मृत्यु सांप के काटने से नहीं होती है। इसी वजह से गुग्गावीर की आराधना नाग देवता के रूप में भी की जाती है और लोग मन्नत मांगते हैं।