New Delhi: सुप्रीम कोर्ट ने संविधान की दसवीं अनुसूची (दल-बदल रोधी कानून) के विलय से जुड़े प्रावधानों पर पुनर्विचार करने की याचिका स्वीकार कर ली है। वरिष्ठ अधिवक्ता और निर्दलीय राज्यसभा सांसद कपिल सिब्बल द्वारा व्यक्तिगत रूप से दायर इस जनहित याचिका पर सुनवाई करते हुए कोर्ट ने केंद्र सरकार को नोटिस जारी किया है।
जस्टिस पी.एस. नरसिम्हा और जस्टिस आलोक अराधे की पीठ ने सुनवाई के दौरान कहा कि इस संवेदनशील विषय में कई महत्वपूर्ण पहलू शामिल हैं, जिन पर संसद को गंभीरता से विचार करने की आवश्यकता है। यह याचिका हाल ही में कई बड़े राजनीतिक दलों के सांसदों और विधायकों द्वारा किए गए दल-बदल के संदर्भ में दायर की गई है।
दसवीं अनुसूची के पैराग्राफ 4 के गलत इस्तेमाल पर उठाए सवाल
कपिल सिब्बल ने दलील दी कि दसवीं अनुसूची का पैराग्राफ 4 केवल दो-तिहाई जनप्रतिनिधियों के अलग होने पर अयोग्यता से राहत देता है। हालांकि, इसका उपयोग राजनीतिक दलों द्वारा बिना मूल पार्टी के विलय के ‘मानद विलय’ का दावा करने के लिए किया जा रहा है। इससे लोकतांत्रिक जनादेश को अनुचित तरीके से बदला जा रहा है।
वरिष्ठ अधिवक्ता ने अदालत को बताया कि इस कानूनी लूपहोल के कारण देश में बड़े पैमाने पर खरीद-फरोख्त और बिना किसी सिद्धांत के राजनीतिक दलों को तोड़ने की संस्कृति को बढ़ावा मिल रहा है। इसके कारण जनता द्वारा चुने गए प्रतिनिधि चुनाव जीतने के बाद आसानी से दूसरी सत्ताधारी पार्टी में शामिल होकर अपनी अयोग्यता से बच जाते हैं।
संसद द्वारा पारित कानून और जनहित याचिका पर कोर्ट की टिप्पणी
सुप्रीम कोर्ट की पीठ ने सुनवाई के दौरान स्पष्ट किया कि चूंकि यह जनप्रतिनिधियों के नियमन के लिए संसद द्वारा पारित कानून है, इसलिए इसमें आवश्यक सुधार करना भी संसद का ही प्राथमिक दायित्व है। हालांकि, मामले की गंभीरता को देखते हुए अदालत ने इस जनहित याचिका को गोवा के लंबित दल-बदल मामले के साथ संबद्ध कर दिया है।
सिब्बल ने याचिका में उल्लेख किया कि गोवा, महाराष्ट्र, कर्नाटक, मध्य प्रदेश और अरुणाचल प्रदेश जैसे राज्यों में दल-बदल कानून के बेअसर होने से सरकारें गिरी हैं। उन्होंने मांग की कि संविधान के मूल ढांचे की रक्षा के लिए इस कानून की नई और कठोर व्याख्या की जानी चाहिए, ताकि लोकतंत्र की मर्यादा बनी रहे।