Delhi News: संसद का मानसून सत्र भारी हंगामे और सरकार तथा विपक्ष के बीच तीखे टकराव के बाद गुरुवार को अनिश्चितकाल के लिए स्थगित हो गया। पूरे सत्र के दौरान लगातार विरोध प्रदर्शन और नारेबाजी की वजह से दोनों सदनों की कार्यवाही बार-बार प्रभावित हुई और कामकाज बाधित रहा।
विपक्ष ने नीट से जुड़ी अनियमितताओं, दिल्ली में प्रदर्शनकारियों पर पुलिस कार्रवाई और राम मंदिर चढ़ावे जैसे कई गंभीर मुद्दों पर सरकार को घेरा। दूसरी तरफ सरकार ने भारी विरोध के बावजूद अपने विधायी कामकाज को आगे बढ़ाया। इस खींचतान की वजह से सदन में लगातार व्यवधान की स्थिति बनी रही।
सत्र की समाप्ति पर राज्यसभा के सभापति सीपी राधाकृष्णन ने सदन में बार-बार हुई अव्यवस्था पर गहरी चिंता जाहिर की। उन्होंने जानकारी दी कि उच्च सदन कुल 37 घंटे और 49 मिनट ही चल सका। इस सीमित अवधि के बावजूद सदन ने अपना विधायी कार्य पूरा किया और 12 विधेयकों को पारित कराया।
सभापति ने कहा कि सांसदों के पास जनता के महत्वपूर्ण मुद्दों को उठाने का बेहतरीन अवसर था। हालांकि, बार-बार होने वाले हंगामे के कारण इस समय का पूरा इस्तेमाल नहीं हो सका। उन्होंने संसदीय गरिमा और सही आचरण बनाए रखने पर जोर दिया, क्योंकि व्यवधान से जनता का संसद पर भरोसा कमजोर होता है।
लोकसभा की कार्यवाही स्थगित होने के बाद अध्यक्ष ओम बिरला के कक्ष में विभिन्न राजनीतिक दलों के नेताओं की अनौपचारिक बैठक हुई। इस बैठक में विपक्षी और सत्ता पक्ष के नेताओं ने चाय पर एक साथ बातचीत की। सदन की कार्यवाही खत्म होने के तुरंत बाद यह मुलाकात आयोजित की गई थी।
उधर, राज्यसभा ने हंगामे के बीच खनिज और खनन (विकास एवं विनियमन) संशोधन विधेयक, 2026 को मंजूरी दे दी। चर्चा के दौरान टीएमसी सांसद सागरिका घोष की केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह पर की गई टिप्पणी से हंगामा बढ़ गया। उन्होंने गृह मंत्री की अनुपस्थिति पर सवाल उठाए, जिसके बाद विपक्षी सांसदों ने नारेबाजी शुरू कर दी।
आरजेडी सांसद मनोज झा ने इस विधेयक पर सवाल उठाते हुए आरोप लगाया कि यह वित्तीय संघवाद को कमजोर कर केंद्रीकरण को बढ़ावा देता है। उन्होंने देश में बढ़ती आर्थिक असमानता और आदिवासियों की स्थिति पर चिंता व्यक्त की। साथ ही उन्होंने सांसदों को उमर खालिद की पीएचडी थीसिस पढ़ने की सलाह भी दी।
मनोज झा ने जून में प्रकाशित थीसिस ‘Fractured Communities: Adivasi Histories and the Politics of Power’ का जिक्र किया। इसमें सिंहभूम के आदिवासी समाज और सत्ता के संबंधों का विस्तृत अध्ययन किया गया है। उन्होंने सवाल उठाया कि देश में गरीबों और आदिवासियों की स्थिति लगातार क्यों खराब हो रही है।
पूरा मानसून सत्र राजनीतिक रार और हंगामे की भेंट चढ़ गया। विपक्ष जहां अपनी मांगों पर अड़ा रहा, वहीं सरकार ने अपने बिल पास कराए। अंतिम दिन भी दोनों सदनों में भारी हंगामा देखने को मिला और अंततः संसद की कार्यवाही को अनिश्चितकाल के लिए स्थगित कर दिया गया।